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नव अंधकार युग: जब विज्ञान शोषण का हथियार बन गया "The New Dark Age: When Science Became a Tool of Exploitation"

🔶 भूमिका: सभ्यता के उत्कर्ष में छिपा अंधकार विज्ञान और तकनीक का विकास मानवता की सबसे बड़ी विजय माना जाता है, किंतु आज वही विज्ञान – यदि कुछ शक्तिशाली राष्ट्रों के हाथों में एकतरफा केंद्रित हो जाए – तो यह विकास नहीं, दासता का औजार बन जाता है। इतिहास में जिस अंधकार युग (Dark Age) को धार्मिक कट्टरता और ज्ञान विरोधी प्रवृत्तियों से जोड़कर देखा जाता था, अब उसका नया संस्करण उभर रहा है — “नव अंधकार युग”, जिसका आधार डेटा, ड्रोन, डिज़िटल निगरानी, जैव-तकनीक, और साइबर सत्ता है। धर्म के स्थान पर AI, और तलवार की जगह सैटेलाइट। 🔶 नव अंधकार युग की परिभाषा: तकनीकी गुलामी की शुरुआत “नव अंधकार युग” वह दौर है जहां: विज्ञान और तकनीक को मानव हित की जगह नियंत्रण और दमन का हथियार बना दिया गया हो। सूचना, भोजन, स्वास्थ्य और सुरक्षा को डेटा के माध्यम से ‘मोनेटाइज़’ कर लिया गया हो। केवल 8–10 विकसित देश पूरे विश्व की चेतना और संप्रभुता को तकनीकी औजारों के माध्यम से नियंत्रित करने लगें। 🔶 अंधकार की चार दीवारें: नव अंधकार युग की विशेषताएं 1. तकनीकी उपनिवेशवाद (Technological Colonization) अफ्रीका, एशिया और लैटिन अ...

अमेरिका रूस और भारतीय मेधा बनाम श्रम

बदलते दौर में भारतीय मानव श्रम की वैश्विक मांग और चुनौतियाँ 1. प्रस्तावना: श्रम के लिए बदलती वैश्विक ध्रुवता भारत, जो कभी श्रम-आपूर्तिकर्ता देश के रूप में देखा जाता था, आज तकनीकी, औद्योगिक, स्वास्थ्य, निर्माण और सुरक्षा क्षेत्र में एक ‘मैनपावर सुपरपावर’ बनकर उभरा है। बदलते दौर में रूस और इज़राइल जैसे देश भारत से सीधे मानव श्रम आयात की वकालत कर रहे हैं, जबकि खाड़ी देशों में भारतीय श्रमिकों की विशाल उपस्थिति पहले से ही मौजूद है। वहीं, अमेरिका जैसे देश में, राजनीतिक बदलाव और चुनावी बयानबाज़ी के तहत भारत से जाने वाले टेक्नोक्रेट्स पर प्रतिबंध लगाने की चेतावनी भी दी जा रही है — विशेषतः ट्रंप जैसे नेताओं द्वारा। 2. रूस-इज़राइल की मांग: भारत से कुशल-अकुशल मानव बल रूस की रणनीति: युद्ध और श्रम का संतुलन रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस को कुशल निर्माण, आधारभूत ढांचे की मरम्मत, और तकनीकी पुनर्निर्माण के लिए श्रमिकों की जरूरत है। भारत से श्रमिक आयात की पहल रूस की श्रम शक्ति की भरपाई का प्रयास है। रूसी प्रस्ताव ‘विशेष श्रमिक वीज़ा व्यवस्था’ के तहत भारत को एक विश्वसनीय भागीदार मानता है। इज़राइल: कृषि स...

फारुख अब्दुल्ला ! भाजपा की विश्वनीति का नया पैंतरा या नेहरूवादी प्रतीक की वापसी"

1. प्रस्तावना: एक चेहरा, अनेक संदेश  फारुख अब्दुल्ला — कश्मीरी, मुसलमान, अनुभवी, और भारत के लोकतंत्र का पुराना चेहरा। और अब, संभावित उपराष्ट्रपति? क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक संकेत है, या भारत की वैश्विक नीति में एक चतुर कदम? जब उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के संभावित इस्तीफे की चर्चा चल रही है, और विश्व राजनीति भारत से एक "समावेशी, शांतिपूर्ण, और संतुलित" नेतृत्व की अपेक्षा कर रही है, ऐसे में फारुख अब्दुल्ला जैसे कश्मीरी मुस्लिम नेता का नाम चर्चा में आना अप्रत्याशित नहीं। नेहरूवादी युग में जिस प्रकार प्रतीकात्मक राजनीति से अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को साधा जाता था — जैसे अबुल कलाम आज़ाद को शिक्षा मंत्री बनाना, या ज़ाकिर हुसैन को राष्ट्रपति — उसी प्रकार भाजपा अगर अब फारुख अब्दुल्ला को उपराष्ट्रपति बनाती है, तो यह संकेत देगा कि भारत मुसलमानों और कश्मीर को हाशिये पर नहीं, सत्ता-केन्द्र में देखता है। 2. भाजपा और फारुख अब्दुल्ला: विरोध या समीकरण?  भारतीय राजनीति में "स्थायी दुश्मन" जैसी कोई चीज़ नहीं होती। फारुख अब्दुल्ला, जो कभी कांग्रेस के सहयोगी रहे, जिन्होंने अक्सर भाजपा की आ...

चीन रूस अमेरिका ट्रैप या नेहरू नीति की वापसी

🔹 1. नेहरूवादी विश्वनीति की वापसी? ✅ गुटनिरपेक्षता की छाया नेहरू की सबसे बड़ी कूटनीतिक विरासत थी गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM)। आज जब भारत रूस-अमेरिका युद्ध (यूक्रेन) में किसी एक पक्ष का खुला समर्थन नहीं करता, ईरान-इज़राइल टकराव में मौन रहता है और चीन से तनाव के बावजूद संवाद बनाए रखता है — तो यह नेहरू की "सभी से दोस्ती, किसी का गुलाम नहीं" नीति की झलक देता है। ✅ संप्रभुता का ज़ोर नेहरू की तरह मोदी सरकार भी संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी सदस्यता की बात करती है, वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज़ को बुलंद करती है, और पश्चिमी दबाव के बावजूद तेल नीति या रक्षा सौदों में आत्मनिर्भर निर्णय लेती है। ✅ ब्रिक्स, एससीओ और ग्लोबल साउथ की ओर झुकाव नेहरू ने एशिया-अफ्रीका एकता की बात की थी। आज भारत ब्रिक्स और एससीओ के ज़रिए एक वैकल्पिक ध्रुव रचने की कोशिश कर रहा है जो अमेरिकी नेतृत्व वाले वेस्टर्न एलायंस से इतर है। --- 🔹 2. क्या भाजपा रूस-अमेरिका-चीन के ट्रैप में है? ⚠️ तीनों महाशक्तियों का अलग-अलग एजेंडा अमेरिका चाहता है कि भारत QUAD और Indo-Pacific में उसकी रणनीति का हिस्सा बने। रूस ...

क्या फारूक अब्दुल्ला बन सकते हैं भारत के अगले उपराष्ट्रपति?

एक कश्मीरी मुसलमान चेहरा, जो दे सकता है राजनीति को नई दिशा 🔷 भूमिका: नई दिल्ली की कुर्सी, नई सोच का संकेत? 2025 की भारतीय राजनीति एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहाँ चुनावी रणनीति, सामाजिक समरसता और वैश्विक कूटनीति – तीनों एक-दूसरे से टकरा नहीं, बल्कि पूरक बनती दिख रही हैं। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के संभावित इस्तीफे या अन्य बदलाव की चर्चा के बीच एक नाम उभरता है — डॉ. फारूक अब्दुल्ला, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री, नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता और NDA के पूर्व सहयोगी। क्या यह मुमकिन है कि एक कश्मीरी मुस्लिम चेहरा भारत का अगला उपराष्ट्रपति बने? यह सवाल महज एक पद की राजनीति नहीं है, यह भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान, कश्मीर नीति, और वैश्विक संदेश का सवाल भी है। 🔷 1. फारूक अब्दुल्ला: अनुभव, संतुलन और प्रतीकात्मकता का नाम डॉ. फारूक अब्दुल्ला तीन बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और एक अनुभवी सांसद भी। वह न केवल कश्मीरी राजनीति का सबसे प्रमुख चेहरा हैं, बल्कि एक उदारवादी, राष्ट्रवादी मुसलमान नेता के तौर पर भी जाने जाते हैं। वे पहले भी NDA का समर्थन कर चुके हैं। भाजपा और पीडीपी ने ज...

मुस्लिम चेहरा और भारतीय विश्वनीति: प्रतीकवाद से रणनीति तक की यात्रा"

  भूमिका: 21वीं सदी के तीसरे दशक में भारत एक असाधारण कूटनीतिक संतुलन का दौर जी रहा है। एक ओर वैश्विक शक्तियाँ – अमेरिका, रूस, चीन – आपसी संघर्षों में उलझी हैं, वहीं भारत एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभर रहा है जो विकासशील देशों की आवाज बनना चाहता है। इस समग्र प्रयास में यदि भारत कोई मुस्लिम चेहरा विश्वनीति में आगे लाता है – उपराष्ट्रपति, विदेश मंत्री या किसी वैश्विक मंच पर प्रतिनिधि के रूप में – तो यह केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से गहरे प्रभाव वाला कदम हो सकता है। 1. भारत और मुस्लिम विश्व: ऐतिहासिक संदर्भ भारत का इस्लामिक दुनिया से रिश्ता केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक रहा है। मुगलकाल, अरब व्यापार, सूफी परंपरा और 20वीं सदी के भारत-पाक विभाजन ने भारत के मुस्लिम विश्व से संबंधों को जटिल बनाया। 1947 के बाद पाकिस्तान ने OIC जैसे मंचों में भारत को अलग-थलग करने की कोशिश की। भारत ने हमेशा धर्मनिरपेक्ष नीति अपनाते हुए अरब देशों से रिश्ते बनाए रखे। 1990 के दशक में खाड़ी युद्ध और प्रवासी भारतीयों की भूमिका ने भारत की पश्चिम एशिया नीति को नया आ...

भारत का कार्यबल: उत्पादन की ताकत या पलायन की मजबूरी

"भारत का कार्यबल: उत्पादन की ताकत या पलायन की मजबूरी? प्रस्तावना: 21वीं सदी के दूसरे दशक में भारत को "विश्व की कार्यशाला" (Factory of the World) बनने का सुनहरा अवसर प्राप्त था। विशाल युवा जनसंख्या, तकनीकी क्षमता, लोकतांत्रिक व्यवस्था, और सस्ता श्रम — इन सबको देखते हुए भारत को वैश्विक उत्पादन और आउटसोर्सिंग का प्रमुख केंद्र बनना चाहिए था। लेकिन वास्तविकता इससे उलट है। आज भारत स्वयं एक उत्पादन इकाई के बजाय ‘मानव बल निर्यातक देश’ बनता जा रहा है। जब हम कहते हैं कि भारत अपने ही श्रमिकों को विदेश भेजकर आर्थिक लाभ कमा रहा है, तो यह बात सुनने में आर्थिक रूप से लाभकारी प्रतीत होती है, लेकिन नैतिक, सामाजिक और रणनीतिक दृष्टि से यह एक अपमानजनक व्यवस्था बन चुकी है। यह लेख इसी व्यवस्था की तह में जाकर भारत, रूस, अमेरिका और वैश्विक सन्दर्भों में इसका विश्लेषण करता है। --- 1. भारत: एक कार्यबल निर्यातक बनता देश 1.1. जनसंख्या: वरदान या शोषण? भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा जनसंख्या है। अनुमानतः 2025 तक भारत के पास 15–64 आयु वर्ग के लगभग 90 करोड़ लोग होंगे। यह कार्यबल उत्पादन, नवाचार औ...

नव उपनिवेशवाद और चीन-अमेरिका की अधिनायकवादी भूमिका: एक वैश्विक उदारवाद की नींव पर तानाशाही की इमारत

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विश्व राजनीति की वर्तमान धारा में उपनिवेशवाद का पुराना चेहरा अपने पंख समेट चुका है, लेकिन उसके पंजे अब भी गहरे धँसे हैं — नव उपनिवेशवाद के रूप में। पहले की भाँति यह न तो बंदूकों से आता है, न ही झंडे फहराता है। यह आता है ऋण की संधियों में छिपकर, तकनीकी साझेदारियों की आड़ में और लोकतंत्र व वैश्विक सुरक्षा की दुहाई देकर। इस नव उपनिवेशवाद के दो सबसे मुखर प्रतिनिधि हैं — अमेरिका और चीन। एक ‘लोकतंत्र का चैंपियन’ बनकर आता है, तो दूसरा ‘विकास का ठेकेदार’ बनकर। परंतु दोनों का मकसद एक ही है — प्रभुत्व, नियंत्रण और अधिनायकवाद। 1. नव उपनिवेशवाद की पुनर्परिभाषा नव उपनिवेशवाद वह आधुनिक सत्ता-प्रवृत्ति है जिसमें आर्थिक स्वतंत्रता का भ्रम पैदा करके देश की नीतियों, संसाधनों और विचारों पर बाहरी नियंत्रण कायम किया जाता है। यह बंदूकें नहीं चलाता, पर कर्ज़ की चाबुक से मारता है। यह सेनाएँ नहीं भेजता, लेकिन सैन्य संधियों से बाँध लेता है। यह संस्कृति को हथियाता है, भाषा को बदलता है और परंपराओं को आधुनिकता के नाम पर लील लेता है। 2. अमेरिका: लोकतंत्र की ओट में आर्थिक साम्राज्यवाद अमेरिका की नव उपनिवेशवा...

भारत की विश्वनीति का त्रिकोणीय छल

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 🌍 झांसा सबने दिया, साथ किसी ने नहीं दिया 🌟 प्रस्तावना: भारत की विदेश नीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ उसे बार-बार अपने तथाकथित रणनीतिक साझेदारों की ओर देखना पड़ता है — कुछ आशा में, कुछ विवशता में। अमेरिका, रूस और चीन जैसे महाशक्तियों के साथ दशकों से चले आ रहे रिश्ते अब नए समीकरणों में उलझे हैं। भारत को हर मंच पर सहयोग का आश्वासन मिला, लेकिन जब भी समय आया, झांसा मिला, साथ नहीं। यह लेख इसी त्रिकोणीय छल को गहराई से समझने का प्रयास है — विश्लेषणात्मक, आलोचनात्मक और चिंतनशील दृष्टिकोण के साथ। 🇺🇸 अमेरिका: लोकतंत्र का साझेदार या रणनीतिक व्यापारी? भारत-अमेरिका संबंधों में पिछले दो दशकों में जितना संवाद हुआ, उतना शायद किसी और देश से नहीं। Indo-US nuclear deal, QUAD की स्थापना, Indo-Pacific की अवधारणा — सब भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करने की दिशा में रखे गए कदम थे। परंतु नीतिगत गहराई से देखें तो इनका उद्देश्य भारत को चीन के विरुद्ध एक मोहरा बनाना अधिक था, न कि उसे बराबरी का रणनीतिक साझेदार बनाना। भारत को आज तक UNSC में स्थायी सदस्यता के लिए अमेरिका का ठोस समर्थन नहीं मि...

मुस्लिम शासन में भंगियों की स्थिति

  मध्यकालीन भारत में मुस्लिम शासन (लगभग 12वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक) के दौरान भंगी समुदाय, जिन्हें आज सफाईकर्मी या वाल्मीकि समुदाय के नाम से भी जाना जाता है, की स्थिति अत्यंत ही दयनीय, उपेक्षित और अपमानजनक बनी रही। भंगियों को भारतीय वर्ण व्यवस्था में सबसे निम्न, अछूत और अपवित्र समझा गया, और मुस्लिम शासनकाल में भी उनकी यह सामाजिक स्थिति बरकरार रही, बल्कि कुछ पहलुओं में और अधिक सख्त और कठोर रूप ले ली। --- 1. सामाजिक स्थिति भंगियों को समाज में अछूत माना जाता था। उन्हें नगरों और कस्बों की सीमा से बाहर बसने के लिए विवश किया गया। वे मुख्यतः मल-मूत्र सफाई, मृत पशुओं को उठाने, चमड़ा निकालने और कूड़ा-कचरा हटाने जैसे कार्यों में संलग्न थे। इस समाज को न तो धार्मिक स्वतंत्रता थी, न ही सामाजिक सम्मान। वे मंदिरों, मस्जिदों, सार्वजनिक कुओं, सरोवरों और बाजारों से दूर रखे जाते थे। मुस्लिम शासन में धार्मिक परिवर्तन के बावजूद भंगियों की स्थिति में कोई बुनियादी सुधार नहीं हुआ। कुछ भंगियों को मुसलमान बनाने के प्रयास जरूर हुए, और उनमें से कुछ ने इस्लाम अपना भी लिया, लेकिन उनकी सामाजिक स्थिति में क...

मैला ढोने की प्रथा: मुस्लिम शासन की देन और एक ऐतिहासिक कलंक

भारत में मैला ढोने की अमानवीय प्रथा एक ऐतिहासिक अन्याय है, जिसने लाखों दलितों और विशेष रूप से वाल्मीकि समुदाय (भंगी) को सदियों तक सामाजिक और आर्थिक गुलामी में जकड़ कर रखा। इस प्रथा को अक्सर हिंदू समाज के जातीय ढांचे का परिणाम माना गया, लेकिन गहराई से ऐतिहासिक विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि इस प्रथा को व्यवस्थित, संगठित और संस्थागत रूप से लागू करने में मुस्लिम शासन की प्रमुख भूमिका रही। इस लेख में हम इसी तथ्य की विवेचना करेंगे कि किस प्रकार मुस्लिम शासकों के काल में 'मैला ढोना' एक औपचारिक, विवशकारी और शोषणकारी व्यवस्था में बदल गया। 1. ‘मैला ढोना’ क्या है? 'मैला ढोना' का अर्थ है मानव द्वारा दूसरे मानव का मल-मूत्र साफ करना — खुले में शौच या कच्चे शौचालयों से हाथों, टोकरियों और खप्पचियों की मदद से। यह कार्य जाति-आधारित श्रम व्यवस्था के तहत सदियों से विशेष समुदाय, विशेषकर वाल्मीकि/भंगी समाज को सौंपा गया। --- 2. हिंदू समाज में अस्पृश्यता और श्रम विभाजन प्राचीन हिंदू समाज में जाति व्यवस्था मौजूद थी, परंतु उसके प्रारंभिक रूप में वर्ण व्यवस्था लचीली थी। वैदिक काल में शूद्...

दलित आत्मसम्मान बनाम PDA गठबंधन: राहुल वाल्मीकि प्रकरण से उठते बड़े सवाल

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✍️ विशेष टिप्पणी: जातीय गठबंधन की राजनीति में दलित कौन? सहयोगी या शिकार? उत्तर प्रदेश की राजनीति, जो एक समय में सामाजिक न्याय के नारे और बहुजन एकता की बुनियाद पर खड़ी थी, आज उसी की छाया में दलितों के आत्मसम्मान को लगातार चुनौती मिल रही है। राहुल वाल्मीकि प्रकरण, जो बुलंदशहर जिले में हुआ, केवल एक व्यक्तिगत घटना के रूप में देखा जा सकता था। लेकिन जिस तरह से इसे राजनीतिक, सामाजिक और जातिगत रंग दिया गया, उसने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया कि – क्या आज भी दलितों के लिए राजनीतिक गठबंधन ‘साथी’ हैं या सिर्फ ‘स्वार्थी’? 1. राहुल वाल्मीकि मामला: एक व्यक्तिगत घटना का जातिगत अभियोग जुलाई 2025 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले से एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें भाजपा के जिला मंत्री राहुल वाल्मीकि को एक महिला के साथ कार में ‘आपत्तिजनक स्थिति’ में दिखाया गया। यह वीडियो कब्रिस्तान के पास रिकॉर्ड किया गया था। यह एक आपत्तिजनक मामला था, लेकिन न कोई हिंसा थी, न कोई आपराधिक शिकायत दर्ज की गई थी। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह कहीं अधिक खतरनाक और चिंताजनक था: स्थानीय यादव और मुस्लिम समुदायों के कार्यकर्ताओं ने इस...

🌐 मुक्त बाजार से आर्थिक राष्ट्रवाद की ओर बढ़ती दुनिया

ट्रंप का टैरिफ युद्ध, चीन की संसाधन नीति और नव-उपनिवेशवाद की वापसी 🔸 प्रस्तावना 21वीं सदी का दूसरा दशक एक ऐसे युग की शुरुआत है जहाँ वैश्विक आर्थिक समीकरण पुनः लिखा जा रहा है। एक ओर ट्रंप की टैरिफ वॉर वैश्विक बाज़ारवाद को चुनौती देती है, तो दूसरी ओर चीन की रेयर अर्थ मटेरियल नीति वैश्विक संसाधन सुरक्षा पर दबाव बनाती है। पिछले दशक तक ‘मुक्त बाजार’ का सिद्धांत विश्व व्यापार की आत्मा था, पर अब आर्थिक राष्ट्रवाद, संसाधन संरक्षण, और रणनीतिक निर्भरता समाप्ति का युग आ गया है। अमेरिका और चीन के इस संघर्ष की पृष्ठभूमि में दुनिया एक बार फिर उसी मोड़ पर है जहाँ उपनिवेशवाद की तरह "संसाधनों पर नियंत्रण" और "बाजारों की मोनोपॉली" की भूख से निर्णायक टकराव संभव है। --- 🔸 I. मुक्त बाजार से आर्थिक राष्ट्रवाद की ओर 🌍 1. मुक्त बाज़ार की परिकल्पना विश्व युद्धों के बाद मुक्त बाजार की अवधारणा ने वैश्विक विकास का आधार तैयार किया। WTO, IMF, NAFTA, EU जैसे संगठन इस विचारधारा के वाहक बने। 'मुक्त व्यापार, मुक्त निवेश, और सीमाहीन प्रतिस्पर्धा'—यही मूलमंत्र था। परंतु यह आदर्श तब टूटने लग...

विश्वनीति का डूबता मस्तूल भारत

 यह रहा 3000 शब्दों का विश्लेषणात्मक लेख: "विश्वनीति का डूबता मस्तूल भारत" --- 🌍  (एक समकालीन भारतीय कूटनीति की आलोचनात्मक समीक्षा) 🔷 भूमिका: भारत, जिसे कभी उभरती वैश्विक शक्ति और दक्षिण एशिया का नेता माना जाता था, आज विश्व राजनीति में एक चुप पर्यवेक्षक के रूप में दिखाई देता है। एक समय था जब भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता, आत्मनिर्भरता और नैतिक नेतृत्व पर आधारित थी; लेकिन आज, जब विश्व एक नए शीत युद्ध की ओर बढ़ रहा है, भारत न निर्णय ले पा रहा है, न दिशा तय कर पा रहा है। इस लेख में हम इसी विचार को विस्तार देते हुए विश्लेषण करेंगे कि कैसे भारत की विदेश नीति का मस्तूल (mast) — जो उसे वैश्विक तूफानों में स्थिर रखता था — अब डूबता हुआ प्रतीत हो रहा है। --- 🔷 1. मस्तूल क्या है और भारत का मस्तूल क्या था? "मस्तूल" शब्द जहाज की दिशा और उसकी स्थिरता का प्रतीक है। जैसे समुद्री जहाज का मस्तूल उसे दिशा देता है, वैसे ही किसी राष्ट्र की विदेश नीति उसका वैश्विक मस्तूल होती है। भारत का मस्तूल — उसकी नैतिक विदेश नीति, आत्मनिर्भरता, गुटनिरपेक्षता, और पंचशील जैसे सिद्धांतों से बना थ...

भारतीय विश्व नीति में भारत आज भी सर्वहारा: अब उनके पास सिर्फ ग्लोबल साउथ ही एकमात्र सहारा है

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  भारतीय विश्व नीति में भारत आज भी सर्वहारा: अब उनके पास सिर्फ ग्लोबल साउथ ही एकमात्र सहारा है भारतीय विश्व नीति में भारत आज भी सर्वहारा: अब उनके पास सिर्फ ग्लोबल साउथ ही एकमात्र सहारा है प्रस्तावना: जब भारत ने 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की... 1. भारत: एक ऐतिहासिक 'सर्वहारा' ब्रिटिश राज और वैश्विक मंचों से बहिष्करण... 2. BRICS: शक्ति या भ्रम? चीन का प्रभुत्व, भारत की सीमाएं... 3. SAARC: टूटता क्षेत्रीय सपना पाकिस्तान की बाधाएं, भारत का विमुख होना... 4. QUAD: भारत और अमेरिका के बीच असहज दूरी रणनीतिक तालमेल की कमी, विचारधारा का टकराव... 5. अमेरिका, रूस, चीन — तीनों से दूरी भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का मूल्य... 6. संयुक्त राष्ट्र और G7 से लगातार बहिष्करण सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट न मिलना, G7 में अनदेखी... 7. ग्लोबल साउथ: भारत की नैतिक और रणनीतिक आशा वैक्सीन मैत्री, डिजिटल सहयोग और दक्षिण देशों का विश्वास... ...

विश्व राजनीति में भारत सर्वहारा, अब बस ग्लोबल साउथ का सहारा"

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  " यह लेख भारत की ऐतिहासिक स्थिति, वर्तमान वैश्विक भूमिका, और ग्लोबल साउथ के लिए उसके नेतृत्व की गहराई से पड़ताल करता है। --- विश्व राजनीति में भारत सर्वहारा, अब बस ग्लोबल साउथ का सहारा --- 🔶 प्रस्तावना: उपेक्षित से नेतृत्वकर्ता बनने की यात्रा "भारत एक समय था जब विश्व राजनीति का हाशियाई पात्र था, आज वह उस दुनिया का नैतिक धुरी बनता जा रहा है जिसे 'ग्लोबल साउथ' कहा जाता है।" यह यात्रा केवल आर्थिक नहीं, नैतिक और ऐतिहासिक चेतना की यात्रा है। भारत, जिसने उपनिवेश झेला, वैश्विक मंचों पर उपेक्षा सही, कभी G7 का हिस्सा नहीं बना — वही भारत आज वैश्विक सर्वहारा से ग्लोबल साउथ का सहारा बन गया है। --- 🔶 1. भारत: जो खुद उपेक्षित था 🏴 उपनिवेशवाद की विरासत 200 वर्षों तक ब्रिटिश राज में भारत का आर्थिक और सामाजिक शोषण हुआ। भारत एक समय वैश्विक GDP में 25% तक का भागीदार था — परंतु उपनिवेशवाद ने उसे "विचार और विकास का सर्वहारा" बना दिया। ❄️ शीतयुद्ध काल में दोहरे मानदंड भारत की गुटनिरपेक्षता को भी अक्सर ‘अविकसित राष्ट्रों की चुप्पी’ समझा गया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद...

ग्लोबल साउथ का सहारा भारत: विश्व राजनीति का सर्वहारा

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  --- --- प्रस्तावना: जब दुनिया के ‘हारे’ फिर सहारा खोजते हैं दुनिया की राजनीति एक बार फिर टकराव के मुहाने पर खड़ी है। अमीर और गरीब देशों के बीच की खाई चौड़ी हो रही है, तकनीकी प्रभुत्व के नाम पर नई उपनिवेशवादी शक्तियाँ उभर रही हैं, और ग्लोबल साउथ — यानी अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका जैसे राष्ट्र — फिर हाशिये पर धकेले जा रहे हैं। लेकिन ऐसे दौर में भारत एक नई भूमिका में उभर रहा है — न कोई वैश्विक साम्राज्यवादी, न किसी गुट का अंधसमर्थक, बल्कि एक ऐसा राष्ट्र जो विश्व राजनीति का "सर्वहारा" है — जिसने खोया भी बहुत, सहा भी बहुत, पर अब दूसरों के दुःख का संबल बनने की शक्ति अर्जित की है। यह लेख भारत की इसी ऐतिहासिक भूमिका को व्याख्यायित करता है — कि कैसे आज भारत उन सभी "हारे हुओं" का सहारा बन रहा है, जिन्हें पश्चिमी साम्राज्यवाद, तकनीकी शोषण, युद्ध और संसाधन-लूट ने वर्षों तक छला। --- 1. ‘सर्वहारा’ भारत: जिसने उपनिवेश झेला, और आत्मनिर्भर बनकर उभरा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: भारत खुद 200 वर्षों तक अंग्रेजी साम्राज्यवाद का शिकार रहा। आर्थिक दोहन, सांस्कृतिक विखंडन और राजनैतिक पराजय का ...