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देश जब पहलगांव का मातम मना रहा था, तब मोदी ने जातिगत जनगणना को तुरुप का पत्ता क्यों बनाया?

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भारतीय लोकतंत्र में राजनीति और संवेदना की दूरी दिन-ब-दिन कम होती जा रही है। कई बार तो यह दूरी इतनी घुल-मिल जाती है कि यह पहचानना कठिन हो जाता है कि सरकार किसी मुद्दे पर प्रतिक्रिया दे रही है या किसी नए मुद्दे के सहारे पुराने घावों पर परदा डाल रही है। ऐसा ही कुछ देखने को मिला जब देश पहलगाम की त्रासदी में डूबा हुआ था और उसी समय केंद्र सरकार ने जातिगत जनगणना के मुद्दे को हवा दी — न सिर्फ हवा दी, बल्कि इसे राजनीतिक तुरुप के पत्ते की तरह प्रयोग किया। क्या यह मात्र संयोग था या एक सुनियोजित रणनीति? क्या यह "सामाजिक न्याय" की ओर एक ईमानदार पहल थी या "सुरक्षा असफलता" से ध्यान हटाने का एक राजनीतिक प्रयास? आइए इन प्रश्नों के उत्तर एक-एक कर खोजते हैं। पहलगाम: मातम, व्यथा और सरकार की विफलता पहलगाम जम्मू-कश्मीर का एक प्रसिद्ध धार्मिक और पर्यटक स्थल है। अमरनाथ यात्रा का यह प्रमुख पड़ाव हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। लेकिन वर्ष 2025 में यह स्थान श्रद्धा और पर्यटन का नहीं, बल्कि सुरक्षा की विफलता, आतंकी हमले और प्रशासनिक चूक का प्रतीक बन गया। पहलगाम की इस घटना में ...