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भारत का कार्यबल: उत्पादन की ताकत या पलायन की मजबूरी

"भारत का कार्यबल: उत्पादन की ताकत या पलायन की मजबूरी? प्रस्तावना: 21वीं सदी के दूसरे दशक में भारत को "विश्व की कार्यशाला" (Factory of the World) बनने का सुनहरा अवसर प्राप्त था। विशाल युवा जनसंख्या, तकनीकी क्षमता, लोकतांत्रिक व्यवस्था, और सस्ता श्रम — इन सबको देखते हुए भारत को वैश्विक उत्पादन और आउटसोर्सिंग का प्रमुख केंद्र बनना चाहिए था। लेकिन वास्तविकता इससे उलट है। आज भारत स्वयं एक उत्पादन इकाई के बजाय ‘मानव बल निर्यातक देश’ बनता जा रहा है। जब हम कहते हैं कि भारत अपने ही श्रमिकों को विदेश भेजकर आर्थिक लाभ कमा रहा है, तो यह बात सुनने में आर्थिक रूप से लाभकारी प्रतीत होती है, लेकिन नैतिक, सामाजिक और रणनीतिक दृष्टि से यह एक अपमानजनक व्यवस्था बन चुकी है। यह लेख इसी व्यवस्था की तह में जाकर भारत, रूस, अमेरिका और वैश्विक सन्दर्भों में इसका विश्लेषण करता है। --- 1. भारत: एक कार्यबल निर्यातक बनता देश 1.1. जनसंख्या: वरदान या शोषण? भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा जनसंख्या है। अनुमानतः 2025 तक भारत के पास 15–64 आयु वर्ग के लगभग 90 करोड़ लोग होंगे। यह कार्यबल उत्पादन, नवाचार औ...

ईरान‑इज़राइल युद्ध और एशियाई शांति में भारत कितना जरूरी है

--- ईरान और इज़राइल के बीच हालिया संघर्ष ने समूचे एशिया को एक नए संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है। जहां एक ओर यह टकराव धार्मिक, सामरिक और राजनीतिक तनावों से उत्पन्न है, वहीं दूसरी ओर इसकी आँच ऊर्जा आपूर्ति, व्यापारिक स्थिरता और क्षेत्रीय सुरक्षा पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। ऐसे समय में भारत की भूमिका एक तटस्थ मध्यस्थ और संभावित शांति-निर्माता के रूप में वैश्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो जाती है। --- 🔥 युद्ध की पृष्ठभूमि: 13 June: Israel launches "Operation Rising Lion" → 14–20 June: Iranian countermeasures, regional escalation → 21 June onward: Global calls for ceasefire → India engages diplomatically with both nations 13 जून 2025 को इज़राइल द्वारा ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों और सैन्य ठिकानों पर किए गए हमले ने दशकों पुरानी कटुता को एक बार फिर उग्र रूप दे दिया है। इसका प्रभाव न केवल पश्चिम एशिया तक सीमित रहा, बल्कि पूरी एशिया की भूराजनीतिक संरचना को हिला कर रख दिया है। --- 🇮🇳 भारत: शांति का संभावित वाहक भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता रही है — संतु...
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  ईरान-इज़राइल युद्ध और पाकिस्तान की पेंडुलम नीति ईरान-इज़राइल युद्ध 2025 पाकिस्तान क्यों पेंडुलम की तरह झूल रहा है? पेंडुलम पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच झूलती विदेश नीति अमेरिका-पाक संबंध शीत युद्ध से लेकर CPEC तक की यात्रा आसिफ मुनीर की बैठक व्हाइट हाउस में गुप्त वार्ता और डील एजेंडा ईरान-पाक रिश्ते धार्मिक असहजता, सीमावर्ती संघर्ष और बार्टर व्यापार ईरान-इज़राइल युद्ध 13 जून के हमले, 22 जून की जवाबी कार्रवाई पाक नीति: दो चेहरा बयान कुछ, व्यवहार कुछ और पेंडुलम क्यों? IMF, सऊदी दबाव, ईरान की सीमा और आतंकवाद भविष्य की दिशा अ...

2025 का ईरान-इज़राइल युद्ध: परमाणु डर और वैश्विक संतुलन की चुनौती

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2025 का मध्य एशियाई परिदृश्य अचानक उस बिंदु पर पहुंच गया जहां परमाणु युद्ध का खतरा केवल एक संभावना नहीं, बल्कि एक गंभीर वास्तविकता बन गई। इज़राइल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध ने केवल दो देशों को नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। यह टकराव इतिहास, धर्म, सामरिक रणनीति और भू-राजनीतिक जटिलताओं का संगम बन गया है। युद्ध की शुरुआत: 13 जून 2025 को इज़राइल ने 'Operation Rising Lion' के तहत ईरान के नतांज़ और फ़ोर्डो जैसे परमाणु प्रतिष्ठानों पर गुप्त ड्रोन और हवाई हमले किए। इस हमले में ईरान की संवेदनशील सैन्य व आणविक सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचा। ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता पर सीधा हमला बताया और उसी रात 150 से अधिक मिसाइलें व 100+ ड्रोन इज़राइल की ओर दागे, जिनमें से अधिकांश को इज़राइल के 'आयरन डोम' ने रोक दिया, लेकिन कुछ मिसाइलें तेल अवीव और हैफा में तबाही मचाने में सफल रहीं। अमेरिका की भूमिका: 22 जून को अमेरिका ने युद्ध में प्रत्यक्ष भागीदारी लेते हुए ईरान के तीन गुप्त परमाणु स्थलों पर ' Operation Midnight Hammer ' के तहत बंकरबस्टर हमले किए। यह अमेरिका...

अमेरिका और ईरान के बीच पेंडुलम पाकिस्तान

🇺🇸 अमेरिका, 🇮🇷 ईरान और 🇵🇰 पाकिस्तान: त्रिकोणीय समीकरण 1. अमेरिका-ईरान शत्रुता का इतिहास: 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से अमेरिका और ईरान के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हैं। अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम और "शिया विस्तारवाद" को लेकर सख्त है। 2. पाकिस्तान की स्थिति: पेंडुलम क्यों? भौगोलिक स्थिति : पाकिस्तान की सीमाएं अफगानिस्तान, ईरान और भारत से लगती हैं। यह अमेरिका और ईरान दोनों के लिए रणनीतिक दृष्टि से अहम है। राजनीतिक झुकाव : अमेरिका से रक्षा सहयोग, IMF ऋण, और अफगान नीति के तालमेल। ईरान से ऊर्जा सहयोग, खासकर पाइपलाइन परियोजनाएं जैसे "IPI गैस पाइपलाइन"। धार्मिक और सामरिक समीकरण : पाकिस्तान एक सुन्नी-बहुल देश है, जबकि ईरान शिया नेतृत्व वाला। इसके बावजूद दोनों में कभी-कभी सहयोग देखने को मिलता है, खासकर अफगान मामले में। 3. पाकिस्तान की दोतरफा नीति: जब अमेरिका अफगानिस्तान में सक्रिय था, पाकिस्तान ने अमेरिकी हितों को साधने का प्रयास किया। वहीं, जब अमेरिका-ईरान तनाव चरम पर पहुंचा, पाकिस्तान ने खुद को 'मध्यस्थ' की भूमिका में प्रस्तुत करने की ...

G7 समिट 2025 में भारत की उपलब्धियाँ

G7 समिट 2025 जापान के ओसाका शहर में आयोजित हुआ। यह सम्मेलन ऐसे समय में हुआ जब विश्व एक नई तकनीकी क्रांति, जलवायु संकट, ऊर्जा असमानता, वैश्विक युद्धों की आशंकाओं और वैश्विक नेतृत्व में परिवर्तन की ओर बढ़ रहा था। भारत को इस बार भी एक प्रमुख साझेदार देश के रूप में आमंत्रित किया गया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कई रणनीतिक मुद्दों पर वैश्विक नेताओं को संबोधित किया। भारत की उपस्थिति का विशेष महत्व: G7 समिट 2025 में भारत की भूमिका केवल एक पर्यवेक्षक की नहीं, बल्कि वैश्विक साझेदारी के सह-निर्माता की थी। भारत की आर्थिक प्रगति, सैन्य मजबूती, डिजिटल तकनीक में विस्तार और वैश्विक दक्षिण की आवाज बनकर उभरने के कारण उसकी उपस्थिति पूरे सम्मेलन में केंद्रीय रही। वैश्विक संकट में भारत का दृष्टिकोण: भारत ने रूस-यूक्रेन संघर्ष, इज़राइल-ईरान तनाव और भारत-पाकिस्तान सीमा पर बढ़ते तनाव के बीच शांति और संवाद को प्राथमिकता देने की अपील की। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है और विश्व को बहुपक्षीय संवाद, वैश्विक कानून व्यवस्था और मानवीय मूल्य...

2025 का वैश्विक धमाल: अमेरिका-चीन, भारत-EU FTA और देसी तड़का

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2025 का वैश्विक धमाल: अमेरिका-चीन, भारत-EU FTA और देसी तड़का 2025 का वैश्विक धमाल: अमेरिका-चीन, भारत-EU FTA और देसी तड़का 🌟 प्रकाशित: 11 जून 2025, 09:24 PM IST | लेखक: Your Name 1. अमेरिका-चीन डील: ग्लोबल व्यापार में Dabangg एंट्री 💥 2025 में अमेरिका और चीन ने लंदन में Rare Earth Minerals Framework Deal साइन कर वैश्विक व्यापार को *Dabangg* स्टाइल में हिला दिया! ये डील चिप्स, AI, और ग्रीन एनर्जी के लिए ज़रूरी रेयर अर्थ खनिजों की सप्लाई पक्की करती है। टैरिफ कम हुए, मतलब सामान सस्ता, और कंपनियाँ *Party All Night* मोड में! भारत के लिए मज़ा? हम चिप्स और टेक्नोलॉजी में *Singham* की तरह छा सकते हैं, जैसे सलमान भाई की मूवी में *दमदार* एंट्री! 😎 क्या है ये रेयर अर्थ खनिज? ये वो खनिज हैं ज...

भारत EU और अमेरिका चीन समझौतों का प्रभाव

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अमेरिका-चीन व्यापार समझौता और भारत-EU FTA: वैश्विक अर्थव्यवस्था की नई दिशा अमेरिका-चीन व्यापार समझौता और भारत-EU FTA: वैश्विक अर्थव्यवस्था की नई दिशा प्रकाशित: 11 जून 2025 | लेखक: Your Name 1. अमेरिका-चीन व्यापार समझौता: एक नई शुरुआत भूमिका अमेरिका और चीन, विश्व की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, वर्षों से व्यापारिक तनावों का सामना कर रहे हैं। 2025 में लंदन में हस्ताक्षरित Rare Earth Minerals Framework Deal ने वैश्विक व्यापार में नई उम्मीदें जगाई हैं। यह समझौता आपूर्ति शृंखला, तकनीकी सहयोग और रणनीतिक स्थिरता को मजबूत करने वाला है। समझौते की प्रमुख बातें रेयर अर्थ खनिजों पर सहयोग : चीन ने अमेरिका को पारदर्शी और स्थिर आपूर्ति का आश्वासन दिया। टैरिफ में कमी : कई उत्पादों पर आयात शुल्क ...

ऑपरेशन सिन्दूर 2025

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ऑपरेशन सिन्दूर 2025: भारत का वैश्विक और क्षेत्रीय प्रभाव ऑपरेशन सिन्दूर 2025: भारत का वैश्विक और क्षेत्रीय प्रभाव Post Operation Sindoor: Global and Regional Impact of India in 2025 भूमिका 2025 में काल्पनिक ऑपरेशन 'ऑपरेशन सिन्दूर' भारत की रक्षा और विदेश नीतियों के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ बन गया। इस अभियान ने भारत की सैन्य क्षमता, रणनीतिक इच्छाशक्ति और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी साख को पुनः परिभाषित किया। ऑपरेशन सिन्दूर: पृष्ठभूमि और उद्देश्य 1. पृष्ठभूमि ऑपरेशन की आवश्यकता तब उत्पन्न हुई जब सीमा पर बढ़ती घुसपैठ और आतंकवादी गतिविधियों ने राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाल दिया। 2. उद्देश्य आतंकवादी ठिकानों को निष्क्रिय करना सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति बहाल करना भारत की सुरक्षा नीति में निर्णायकता लाना अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की सक्रियता को सुदृढ़ करना 3. अभियान की संरचना सेना, वायुसेना और खुफिया एजेंसियों के संयुक्त समन्वय से इस अभियान को अंजाम दिया गया। ...

भारत और चीन के एक साथ आने का भारत पर प्रभाव

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भारत और चीन के एक साथ आने का भारत पर प्रभाव पश्चिमी दुनिया एशिया मेन एक नए महा युद्ध की जमीन तलाश रही है | भारत और चीन को आपस मेन उलझाने की कोशिश मेन है | आज एक ब्रिटीश एक्सपर्ट का बयान देखकर आश्चर्य नेहीन हुआ कि भारत को पाकिस्तान को छोड चीन पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए | पर क्यों ? पश्चिमी आर्थिक सामरिक वर्चस्व को चुनौती देने वाली दो एशियाई टकटो को कमजोर कर अमेरिका-यूरोप का सदाबहार बरचसव स्थापित करना इसका एक मात्र कारण है | एशिया का विकास रोकने के लिए ही अमेरिका एशिया की आतंकवादी शक्तियों का पोषक और एशियाई भूमि की अशांति का हेतु रहा है | यदि ये दोनों शक्तियाँ इन संभावनाओं और यूरोपीय दुर्भावनाओं को धता बताते हुए साथ आजाएँ तो क्या हो सकता है ? इसकी एक झलक यहाँ प्रस्तुत है | भारत और चीन के एक साथ आने का भारत पर प्रभाव 21वीं सदी को एशिया की सदी कहा जा रहा है, और इसमें दो मुख्य देश — भारत और चीन — वैश्विक स्तर पर निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। यदि ये दोनों देश सहयोग के पथ पर आते हैं, तो यह भारत के लिए कई मायनों में लाभदायक, तो कई मायनों में चुनौतीपूर्ण भी हो...

बांग्लादेश: दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए नई चुनौती

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बांग्लादेश में हालिया घटनाएं केवल वहां के आंतरिक राजनीतिक परिदृश्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दक्षिण एशिया और व्यापक वैश्विक राजनीति पर भी गहरा प्रभाव डाल रही हैं। यह क्षेत्र, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप और भारतीय सभ्यता का अभिन्न हिस्सा रहा है, अब बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप और कट्टरपंथी ताकतों के उभार का केंद्र बनता जा रहा है। बांग्लादेश: ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव बांग्लादेश का भारतीय उपमहाद्वीप से संबंध केवल भूगोल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक स्तर पर गहरी हैं। शांति, सहिष्णुता और सह-अस्तित्व बांग्लादेश की पहचान का हिस्सा रहे हैं। 1971 में भारत की निर्णायक भूमिका ने बांग्लादेश की स्वतंत्रता को आकार दिया, और इसके बाद से दोनों देशों के संबंध कूटनीतिक और आर्थिक साझेदारी से परिपूर्ण रहे हैं। बदलाव का दौर और बाहरी हस्तक्षेप हालांकि, बांग्लादेश में हाल के वर्षों में जो बदलाव हुए हैं, वे अचानक नहीं हैं। भारत में बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर उठने वाले सवालों और बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता के बीच, बाहरी ताकतें, विशेष रूप से...

चीन की शरण में भारत का पड़ोस

क्यों जरूरी है भारत और पाकिस्तान में तनाव या युद्ध

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युद्ध और युद्ध का कारोबार दोनों एक जैसे हैं। आज की दुनिया में युद्ध होते ही इसलिए हैं, जिससे युद्ध का कारोबार फले-फूले। यूरोप और अमेरिका के विकसित देश अब इसलिए आपस में नहीं लड़ते कि वे रक्षा साधनों का विकास खुद कर सकते हैं , जो न करते हों वे भी इसकी तकनीकी क्षमता से सम्पन्न हैं। अफ्रीका और एशिया समेत दुनिया के तमाम पिछड़े देश उनकी प्रयोगशाला भी है और बाजार भी। इन प्रयोगशालाओं में नरसंहार भी होगा और खरीद-बेसाह, दलाली, मुनाफाखोरी और कालाबाजारी भी। बोफोर्स, ताबूत और राफेल की बात पर हंगामा इसलिए होता है कि विपक्षियों को मुद्दा चाहिए, अन्यथा तीसरी दुनिया का कोई सामरिक खरीद फरोख्त बिना बिचौलिए और घोटाले की नहीं होती। यह क्षेत्र घोटालेबाजों का अतिप्रिय चारागाह रहा है और है। एक ओर इसके कमीशन बड़े और काम रिस्क वाले होते हैं, वहीं सुरक्षा और गोपनीयता के नाम पर इसे छुपाना भी आसान होता है। यदि उससे भी न चले तो जाँच और पारदर्शिता की मांग करने वालों को शत्रुदेशों का एजेंट और राष्ट्रद्रोही कहना और आसान होता है। राष्ट्र की सुरक्षा ऐसा भावुक विषय है कि उसके नाम पर देश की मासूम जनता को बहलाना आस...