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🪷 भारत एशियाई साकार का केंद्र विंदु और पश्चिम की एशियाई चुनौती

  🪷 भारत: एशियाई विकास का स्थिर केंद्र, और उसके चारों ओर रणनीतिक परिधि 🧭 प्रस्तावना: भारत केंद्र क्यों? भारत केवल भौगोलिक दृष्टि से नहीं, बल्कि आर्थिक, वैचारिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक संदर्भों में एशिया के "स्थिर केंद्र" की तरह उभर रहा है। जनसंख्या, तकनीक, लोकतंत्र, नवाचार, कूटनीति और समावेशी विकास — ये सब उसे एशियाई पुनरुत्थान की धुरी बनाते हैं। चीन की आक्रामकता, पाकिस्तान की अस्थिरता, ईरान की वैचारिकता और बांग्लादेश-श्रीलंका की भूराजनीतिक द्वंद्व — ये सब भारत को केंद्र बनाते हैं जिससे स्थिरता की ऊर्जा बाहर की ओर प्रवाहित हो। 🌀 1. भारत: केंद्र की शक्ति और दायित्व पहलू विवरण राजनीतिक विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र — संस्थाओं की स्थायित्व आर्थिक 3.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था, ग्लोबल साउथ का नेतृत्वकर्ता कूटनीतिक G20, BRICS, SCO, QUAD जैसे मंचों में निर्णायक भूमिका सांस्कृतिक योग, आयुर्वेद, बौद्ध-हिंदू धरोहर की वैश्विक स्वीकृति रणनीतिक न्यूक्लियर पावर, ISRO, Digital India, आत्मनिर्भर भारत 📌 भारत की सफलता न केवल अपने लिए है, बल्कि उसके चारों ओर स्थित परिधीय र...

भारत EU और अमेरिका चीन समझौतों का प्रभाव

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अमेरिका-चीन व्यापार समझौता और भारत-EU FTA: वैश्विक अर्थव्यवस्था की नई दिशा अमेरिका-चीन व्यापार समझौता और भारत-EU FTA: वैश्विक अर्थव्यवस्था की नई दिशा प्रकाशित: 11 जून 2025 | लेखक: Your Name 1. अमेरिका-चीन व्यापार समझौता: एक नई शुरुआत भूमिका अमेरिका और चीन, विश्व की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, वर्षों से व्यापारिक तनावों का सामना कर रहे हैं। 2025 में लंदन में हस्ताक्षरित Rare Earth Minerals Framework Deal ने वैश्विक व्यापार में नई उम्मीदें जगाई हैं। यह समझौता आपूर्ति शृंखला, तकनीकी सहयोग और रणनीतिक स्थिरता को मजबूत करने वाला है। समझौते की प्रमुख बातें रेयर अर्थ खनिजों पर सहयोग : चीन ने अमेरिका को पारदर्शी और स्थिर आपूर्ति का आश्वासन दिया। टैरिफ में कमी : कई उत्पादों पर आयात शुल्क ...

भारत और चीन के एक साथ आने का भारत पर प्रभाव

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भारत और चीन के एक साथ आने का भारत पर प्रभाव पश्चिमी दुनिया एशिया मेन एक नए महा युद्ध की जमीन तलाश रही है | भारत और चीन को आपस मेन उलझाने की कोशिश मेन है | आज एक ब्रिटीश एक्सपर्ट का बयान देखकर आश्चर्य नेहीन हुआ कि भारत को पाकिस्तान को छोड चीन पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए | पर क्यों ? पश्चिमी आर्थिक सामरिक वर्चस्व को चुनौती देने वाली दो एशियाई टकटो को कमजोर कर अमेरिका-यूरोप का सदाबहार बरचसव स्थापित करना इसका एक मात्र कारण है | एशिया का विकास रोकने के लिए ही अमेरिका एशिया की आतंकवादी शक्तियों का पोषक और एशियाई भूमि की अशांति का हेतु रहा है | यदि ये दोनों शक्तियाँ इन संभावनाओं और यूरोपीय दुर्भावनाओं को धता बताते हुए साथ आजाएँ तो क्या हो सकता है ? इसकी एक झलक यहाँ प्रस्तुत है | भारत और चीन के एक साथ आने का भारत पर प्रभाव 21वीं सदी को एशिया की सदी कहा जा रहा है, और इसमें दो मुख्य देश — भारत और चीन — वैश्विक स्तर पर निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। यदि ये दोनों देश सहयोग के पथ पर आते हैं, तो यह भारत के लिए कई मायनों में लाभदायक, तो कई मायनों में चुनौतीपूर्ण भी हो...

चीन की शरण में भारत का पड़ोस

भारत विकास का चीन वाला मॉडल अपना रहा है

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पिछले दिनों राजनीतिक गलियारों में दो मुद्दे खास चर्चा में रहे। एक मुद्दा प्रधानमंत्री की चीन यात्रा का था, जिसपर कांग्रेस अध्यक्ष समेत तमाम प्रतिपक्षी पार्टियों ने आपत्ति की और सवाल उठाए थे और दूसरा मुद्दा था लालकिला, जिसपर बीबीसी के रास्ते सरकार को सफाई देनी पड़ी। ये दोनों मुद्दे नितांत अलग हैं। एक अंतराष्ट्रीय राजनीति का है और दूसरा सरकार की सांस्कृतिक और आर्थिक नीतियों से जुड़ा है। इसी के साथ एक तीसरा मुद्दा भी लेते हैं जो अकादमिक दुनिया के गलियारों में काफी हलचल और ऊहापोह मचाने वाला रहा है। ये तीनों एक खास दृष्टि से संवेदनशील और एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इनके आपसी समबद्धों की पड़ताल से हम वर्तमान सरकार की भावी योजनाओं को समझने की दृष्टि पा सकते हैं । प्रधानमंत्री की चीन यात्रा का उद्देश्य अनौपचारिक मैत्री यात्रा थी। ऐसा नहीं कि भारत और चीन के बीच सब सुलझ गया हो और दोनों गलबहियां डाले साथ-साथ चलने के लिए प्रतिबद्ध हो गए हों, पर इतना तो हुआ ही कि  तमाम प्रश्नवाचकों को परे धकेलते हुए दोनों देशों के राजनीतिक प्रमुखों ने आपस में मिलने का साहस किया या इच्छा जताई। आखिर क्यों ? ह...

अनौपचारिक होते हुए भी क्यों बेहद ज़रूरी है पीएम मोदी का चीन दौरा

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भारत के प्रधानमंत्री माननीय मोदी वर्तमान में चीन के अनौपचारिक दौरे पर हैं।  यह पूर्व घोषित तथ्य है कि इसमें प्रत्यक्ष कुछ हासिल नहीं होने वाला है, कोई समझौता नहीं होगा।  इसलिए इस दौरे को लेकर ना जनता में उतना उत्साह है और न मीडिया में। भारत और चीन जैसे दो बड़े देशों, पड़ोसी देशों, उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं और एशिया महाद्वीप की स्थिरता को बनाए रखने के लिए उत्तरदायी देशों की यह मुलाकात फिर भी मायने रखती है । लेकिन, भारतीय प्रधानमंत्री का अचानक अनौपचारिक पाकिस्तान दौरे की कहानी मीडिया से लेकर सोशल मीडिया के लिए जितना आकर्षण का केंद्र बनी थी, उतना उनका यह दौरा नहीं है।  इसके पीछे भारतीय मानस में पाकिस्तान के प्रति बैठी हुई गहरी दुश्मनी है, जिसे मीडिया बार-बार उकसाता रहा है।  संबंध भारत-चीन के बीच भी प्रायः तनावपूर्ण ही रहे हैं। हम एक युद्ध भी लड़ चुके और बार-बार युद्ध के तनाव भी झेल चुके हैं, फिर भी भारतीयों के भीतर चीन के प्रति वह दुश्मनी का भाव नहीं है। सामाजिक माध्यमों पर तमाम नारों और बहिष्कार के पोस्टरों के बावजूद यह भ्रम ही साबित हुआ है कि भारत की जनता चीनी मा...