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दिसंबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Silence of Buddhist Nations and China’s Tibet Policy

 दुनिया के बौद्ध देशों की चुप्पी और चीन की तिब्बत नीति Silence of Buddhist Nations and China’s Tibet Policy भूमिका | Introduction बौद्ध धर्म को सामान्यतः करुणा, अहिंसा, सहअस्तित्व और नैतिक साहस का दर्शन माना जाता है। गौतम बुद्ध का संदेश केवल आत्म-मुक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि वह अन्याय, दमन और सत्ता के अहंकार के विरुद्ध एक मौन लेकिन दृढ़ प्रतिरोध भी था। इसके बावजूद आज जब तिब्बत जैसे बौद्ध सभ्यता के मूल केंद्र पर राज्य-प्रायोजित नियंत्रण, सांस्कृतिक क्षरण और धार्मिक दमन जारी है, तब दुनिया के अधिकांश बौद्ध-बहुल देश लगभग पूर्ण चुप्पी साधे हुए हैं। यह चुप्पी साधारण कूटनीतिक विवशता नहीं, बल्कि एक गहरे नैतिक और वैचारिक संकट का संकेत है। तिब्बत: बौद्ध सभ्यता की आत्मा | Tibet: The Soul of Buddhist Civilization तिब्बत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं रहा है। सदियों तक वह महायान और वज्रयान बौद्ध परंपरा का जीवंत केंद्र रहा, जहाँ धर्म केवल आस्था नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक जीवन का आधार था। मठ शिक्षा के केंद्र थे, लामा नैतिक मार्गदर्शक थे और दलाई लामा की संस्था आध्यात्मिक नेतृत्व क...

The Poor Card and the Challenges of India’s Economic Development

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 गरीब कार्ड और भारत के आर्थिक विकास की चुनौतियाँ (The Poor Card and the Challenges of India’s Economic Development) भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था के समकालीन विमर्श में “गरीब कार्ड” एक ऐसा शब्द बन चुका है, जो न केवल चुनावी रणनीति को परिभाषित करता है, बल्कि देश के विकास मॉडल की अंतर्विरोधी प्रकृति को भी उजागर करता है। यह शब्द अपने आप में न तो पूरी तरह नकारात्मक है और न ही पूरी तरह सकारात्मक; बल्कि यह उस सामाजिक-आर्थिक यथार्थ का संकेतक है, जिसमें भारत आज भी जी रहा है। प्रश्न यह नहीं है कि गरीब कार्ड खेला जा रहा है या नहीं, बल्कि यह है कि गरीब कार्ड क्यों आज भी इतना प्रभावी है और यह भारत के आर्थिक विकास के रास्ते में किस प्रकार की चुनौतियाँ खड़ी करता है। 1. गरीब कार्ड: एक राजनीतिक युक्ति या सामाजिक विवशता (Poor Card: Political Tool or Social Compulsion) गरीबी भारत में कोई कृत्रिम गढ़ी गई समस्या नहीं है। यह ऐतिहासिक, औपनिवेशिक, सामाजिक और संरचनात्मक कारणों से बनी हुई वास्तविकता है। आज़ादी के बाद भारत ने योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक क्षेत्र, भूमि सुधार और कल्याणकारी राज्य की अवधार...

India’s Decline in Global Diplomacy and the Illusion of Population Power

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 विश्वकूटनीति में पिछड़ता भारत और जनसंख्या का भ्रम Global power आकांक्षा, आँकड़े और असमंजस Introduction: Aspirations, Numbers, and Strategic Confusion इक्कीसवीं सदी का भारत एक विचित्र आत्मविश्वास और गहरे असमंजस के बीच खड़ा है। विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या, नाममात्र GDP में शीर्ष पाँच अर्थव्यवस्थाओं में स्थान, अंतरिक्ष, डिजिटल और परमाणु क्षमताओं के दावे—इन सबके बावजूद भारत जब भी वैश्विक राजनीति के निर्णायक क्षण आते हैं, तो अक्सर प्रतिक्रिया देने वाला देश बनकर रह जाता है, दिशा तय करने वाला नहीं। यह विरोधाभास केवल नीति की समस्या नहीं, बल्कि दृष्टि की समस्या है। इसी पृष्ठभूमि में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि क्या भारत सचमुच विश्वकूटनीति में पिछड़ रहा है, और यदि हाँ, तो क्या केवल उसकी विशाल जनसंख्या उसे महाशक्ति बना सकती है। महाशक्ति क्या होती है: भारतीय भ्रम बनाम वैश्विक यथार्थ What Defines a Great Power: Indian Perception vs Global Reality भारत में महाशक्ति की धारणा अब भी संख्या-प्रधान है। जनसंख्या, सेना की संख्या, मिसाइलों की रेंज और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में उपस्थिति—इन...

US H-1B Visa Fee Hike: Global Disruptions, Allied Costs, and Strategic Opportunities for India

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 🇺🇸 अमेरिका की H-1B वीज़ा शुल्क नीति और वैश्विक पुनर्संतुलन: भारत के अवसर US H-1B Visa Fee Hike: Global Disruptions, Allied Costs, and Strategic Opportunities for India भूमिका | Introduction वैश्विक प्रतिभा व्यवस्था में निर्णायक बदलाव (A Turning Point in the Global Talent Order) वैश्विक शक्ति-संतुलन आज केवल आर्थिक और सैन्य ताकत से तय नहीं होता; इसका मुख्य आधार है मानव पूँजी, नवाचार क्षमता और वैश्विक प्रतिभा का प्रबंधन। अमेरिका लंबे समय तक इस क्षेत्र में अग्रणी रहा। उसकी तकनीकी श्रेष्ठता, अनुसंधान क्षमता और नवाचार का बड़ा आधार H-1B वीज़ा कार्यक्रम रहा है। लेकिन हाल में H-1B वीज़ा शुल्क को लगभग एक लाख डॉलर तक बढ़ाना केवल आव्रजन नीति नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन पर असर डालने वाला कदम बन गया है। इसके परिणामस्वरूप न केवल अमेरिका के मित्र देशों पर दबाव बढ़ा है, बल्कि वैश्विक प्रतिभा प्रवाह और नवाचार तंत्र में असंतुलन भी उत्पन्न हुआ है। वैश्विक प्रतिभा तंत्र में व्यवधान H-1B शुल्क वृद्धि ने वैश्विक श्रम बाजार में संरचनात्मक झटका (Structural Shock) दिया है। इस नीति के बाद अब विदेशी प...

India–China Strategic Relations, Anti-Dumping Duties & Rare Earth Supply

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भारत-चीन रणनीतिक संबंध, एंटी-डंपिंग शुल्क और दुर्लभ मृदा आपूर्ति --- बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत का राष्ट्रीय हित इक्कीसवीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था केवल व्यापारिक आंकड़ों, आयात–निर्यात के संतुलन या शुल्क दरों तक सीमित नहीं रह गई है। आज व्यापार, प्रौद्योगिकी, कूटनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा आपस में गहराई से जुड़ चुके हैं। किसी भी देश की आर्थिक नीति अब उसकी रणनीतिक शक्ति और भू‑राजनीतिक स्थिति को भी परिभाषित करती है। भारत और चीन—एशिया की दो सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएँ—इसी परिवर्तित वैश्विक परिदृश्य में एक-दूसरे के साथ सहयोग, प्रतिस्पर्धा और सतर्कता के मिश्रित संबंधों में बंधी हैं। भारत द्वारा चीन से आयातित कई उत्पादों पर लगाए गए एंटी‑डंपिंग शुल्क (Anti‑Dumping Duties) और दूसरी ओर चीन द्वारा दुर्लभ मृदा तत्वों (Rare Earth Elements – REEs) की आपूर्ति पर नियंत्रण, केवल व्यापारिक घटनाएँ नहीं हैं। ये दोनों कदम संकेत देते हैं कि आधुनिक विश्व में आर्थिक निर्णय सीधे रणनीतिक संदेश देते हैं। यह लेख भारत‑हित के दृष्टिकोण से इन दोनों मुद्दों का गहन, संतुलित और विस्तृत विश्लेषण प्रस्...

गांधी, विश्व कूटनीति और भारतीय विदेश नीति : भीड़, बुद्धिजीवी और भटकता नागरिक

  भारतीय विदेश नीति आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ दिशाएँ स्पष्ट नहीं हैं, किंतु शोर अत्यधिक है। एक ओर स्वघोषित बौद्धिकों की वह जमात है, जो हर अंतरराष्ट्रीय घटना को वैचारिक नहीं, बल्कि वैचारिक दिखने वाले सत्ता-समर्थक विमर्श में बदल देती है। दूसरी ओर ऐसे राजनीतिक राजकुमार हैं, जो एक ‘क्रुद्ध युवा’ की छवि गढ़कर विदेश नीति को भावनात्मक उकसावे, राष्ट्रवादी उत्तेजना और स्थायी आक्रोश के मंच में बदलने में व्यस्त हैं। तीसरी ओर दायित्व-मुक्त बुद्धिजीवी और यांत्रिक नौकरशाही है, जो नीति के नैतिक परिणामों से स्वयं को अलग रखकर केवल प्रक्रियागत शुद्धता में अपनी भूमिका सीमित कर लेना चाहती है। इन सबकी ठीक विपरीत दिशा में खड़ा है—भकुआया हुआ भारत का आम नागरिक। यह नागरिक न तो विदेश नीति की जटिलताओं को समझ पा रहा है, न ही उसे समझाने का कोई ईमानदार प्रयास हो रहा है। उसके हिस्से में आया है केवल शोर, नारे, भावनात्मक ध्रुवीकरण और भीड़ में शामिल होने का अभ्यास। वह “हूंवा-हूंवा” करती भीड़ का हिस्सा बनना जानता है, विचारशील नागरिक बने रहना नहीं। यही वह बिंदु है जहाँ भारतीय विदेश नीति केवल कूटनीतिक संकट नहीं...

Strategy on China and the Risk of Turning India into the Next Ukraine

 चीन पर अमेरिकी रिपोर्ट और भारत का ‘यूक्रेन-करण’ US Strategy on China and the Risk of Turning India into the Next Ukraine भूमिका | Introduction चीन पर हाल ही में जारी अमेरिकी रणनीतिक रिपोर्ट में भारत और पाकिस्तान का एक साथ उल्लेख कोई साधारण कूटनीतिक विवरण नहीं है। यह एक गंभीर संकेत है—ऐसा संकेत, जिसे यदि भारत ने समय रहते नहीं समझा, तो वह स्वयं को एक ऐसे युद्धक्षेत्र में खड़ा पाएगा जहाँ लड़ाई उसकी होगी, विनाश उसका होगा, लेकिन लाभ और शांति की शर्तें कोई और तय करेगा। यूक्रेन इसका जीवित उदाहरण है। और भारत के संदर्भ में यह आशंका अब केवल कल्पना नहीं, बल्कि रणनीतिक संभावना बनती जा रही है। 1. रिपोर्ट की भाषा: समर्थन या साजिश? Strategic Language: Support or Subtle Trap? अमेरिकी रिपोर्ट कहती है— चीन विस्तारवादी है भारत लोकतांत्रिक संतुलनकारी शक्ति है पाकिस्तान चीनी प्रभाव का माध्यम है सतह पर यह भारत-समर्थक प्रतीत होता है, लेकिन रणनीतिक पाठ कुछ और कहता है: भारत को Frontline State घोषित करना चीन के विरुद्ध संभावित संघर्ष में भारत को पहला मोहरा बनाना पाकिस्तान को permanent irritant की तरह जीवित...

Bangladesh: Delusion and Reality

 **बांग्लादेश: विभ्रम और यथार्थ **भूमिका: एक राष्ट्र, दो मानसिकताएँ Introduction: One Nation, Two Mindsets** हर राष्ट्र का इतिहास केवल घटनाओं से नहीं बनता, वह उसकी सामूहिक मानसिकता से गढ़ा जाता है। बांग्लादेश आज जिस दौर से गुजर रहा है, वह किसी आर्थिक सूचकांक या राजनीतिक सत्ता परिवर्तन से अधिक, एक वैचारिक संघर्ष का दौर है। यह संघर्ष है—विभ्रम और यथार्थ के बीच। एक ओर वह यथार्थ है जो गरीबी, बेरोज़गारी, शिक्षा की गिरावट, सामाजिक असमानता और संस्थागत कमजोरियों के रूप में सामने खड़ा है। दूसरी ओर वह विभ्रम है, जिसे धर्म, राष्ट्रवाद और भावनात्मक गौरव के आवरण में इतना सुसज्जित कर दिया गया है कि वही सत्य प्रतीत होने लगा है। समस्या यह नहीं कि बांग्लादेश के पास संसाधन नहीं हैं या उसकी जनता में क्षमता का अभाव है। समस्या यह है कि उसके समाज और विशेषकर उसके युवा वर्ग को वास्तविक समस्याओं से हटाकर काल्पनिक शत्रुओं और भावनात्मक नारों में उलझा दिया गया है। यही विभ्रम बांग्लादेश के वर्तमान और भविष्य के बीच सबसे बड़ी दीवार बन चुका है। **विभ्रम की उत्पत्ति: यह भ्रम आया कहाँ से? Origin of Delusion: Where ...

Bangladeshi Youth Living Under the Shadow of Delusion**

भ्रम के साये में जीता बांग्लादेशी युवा किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं में बसता है—यह कथन जितना प्रचलित है, उतना ही कठोर भी। क्योंकि यदि युवा चेतनाहीन हो जाए, तो भविष्य स्वयं अंधकार बन जाता है। बांग्लादेश आज इसी ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। जनसंख्या के स्तर पर युवा बहुल यह देश वैचारिक रूप से एक ऐसे दौर में फँसा हुआ है जहाँ भ्रम, अंधविश्वास, धार्मिक उन्माद और बौद्धिक जड़ता ने विवेक और वैज्ञानिक सोच को लगभग अपदस्थ कर दिया है। बांग्लादेशी युवा केवल बेरोज़गारी, गरीबी या राजनीतिक अस्थिरता से नहीं जूझ रहा, बल्कि वह एक सुनियोजित मानसिक निर्माण का शिकार है—जहाँ उसे सोचने से पहले मानने और प्रश्न करने से पहले डरने की शिक्षा दी जाती है। यही कारण है कि यह युवा वर्ग परिवर्तन की शक्ति बनने के बजाय, अक्सर यथास्थिति और उन्माद का वाहक बनता दिखाई देता है। **जनसांख्यिकीय शक्ति या सामाजिक बोझ Demographic Power or Social Burden** बांग्लादेश की लगभग 60 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यह आँकड़ा अपने आप में विकास का संकेत हो सकता था, यदि इसके साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार के अवसर और वैचारिक स्वतं...

China–India–Pakistan in US Strategic Reports

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अमेरिकी रिपोर्टों में चीन–भारत–पाक का उल्ल भारत को बरगलाने और चीन को उकसाने की सुनियोजित साजिश (A Calculated Strategy to Mislead India and Provoke China) भूमिका: रिपोर्ट नहीं, रणनीतिक नैरेटिव Introduction: Not Reports, But Strategic Narratives China–India–Pakistan in US Strategic Reports इक्कीसवीं सदी की वैश्विक राजनीति में “रिपोर्ट” शब्द अब अपने पारंपरिक अर्थ खो चुका है। अमेरिकी थिंक-टैंक, रक्षा मंत्रालय और विदेश नीति से जुड़े संस्थानों द्वारा जारी दस्तावेज़ आज केवल अध्ययन या शोध के लिए नहीं होते, बल्कि वे राजनीतिक दिशा तय करने वाले उपकरण, मनोवैज्ञानिक युद्ध के हथियार और भविष्य के टकरावों की बुनियाद बन चुके हैं। ऐसे में जब अमेरिकी रिपोर्टों में बार-बार चीन, भारत और पाकिस्तान को एक ही संदर्भ में रखा जाता है, तो यह कोई संयोग नहीं होता। यह एक सोची-समझी रणनीतिक फ्रेमिंग है, जिसका उद्देश्य है— भारत को भ्रमित करना, चीन को उत्तेजित करना, और पाकिस्तान को उपयोगी मोहरे की तरह बनाए रखना। अमेरिकी रिपोर्टों की भाषा: विश्लेषण नहीं, फ्रेमिंग The Language of US Reports: Framing, Not Analysis अमेरिकी ...

The Self‑Proclaimed Messiah of the Global South: India on the Cross of World Politics

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  The Self‑Proclaimed Messiah of the Global South: India on the Cross of World Politics दक्षिणी दुनिया का स्वघोषित मसीहा भारत : विश्व‑नीति के सलीब पर टंगा राष्ट्र Introduction: A Dangerous Claim in a Cruel World India is a leader of global south  प्रस्तावना : क्रूर विश्व में एक खतरनाक दावा इक्कीसवीं सदी की वैश्विक राजनीति में सबसे जोखिमभरा काम यदि कोई है, तो वह है स्वयं को नैतिक केंद्र घोषित करना। भारत ने यही किया है। उसने औपचारिक घोषणाओं में भले स्वयं को “नेता” न कहा हो, पर व्यवहार, भाषणों और कूटनीतिक मुद्रा में उसने स्वयं को दक्षिणी दुनिया का स्वघोषित मसीहा प्रस्तुत किया है। यह भूमिका न संयुक्त राष्ट्र ने दी, न अफ्रीका‑एशिया‑लैटिन अमेरिका ने सर्वसम्मति से सौंपी—यह एक ऐतिहासिक आत्म‑दावा है, जिसकी कीमत अब भारत चुका रहा है। The Meaning of Being ‘Self‑Proclaimed’ ‘स्वघोषित’ होने का वास्तविक अर्थ ‘स्वघोषित’ शब्द अपमान नहीं है, बल्कि राजनीतिक यथार्थ है। इतिहास में जितने भी वैचारिक परिवर्तन हुए, वे किसी अंतरराष्ट्रीय सहमति से नहीं, बल्कि किसी एक शक्ति के आत्मविश्वास से शु...

Communal Divisions and Conflicts in South Asia: The Role of China

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  दक्षिण एशिया में सांप्रदायिक विभाजन और टकराव: चीन की भूमिका और वैश्विक राजनीति Communal Divisions and Conflicts in South Asia: The Role of China सांप्रदायिक विभाजन: नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता Communal Divisions Cannot Be Ignored दक्षिण एशिया आज एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल में बार-बार उभरते सांप्रदायिक संघर्ष और टकराव केवल आंतरिक समस्याएँ नहीं हैं। ये संघर्ष: धर्म और पहचान पर आधारित हैं, राजनीतिक और चुनावी अवसरों से प्रेरित हैं, और बाहरी शक्तियों के नैरेटिव से प्रभावित होते हैं। अल्पसंख्यक समुदाय बार-बार निशाना बनते हैं। यह केवल मानवाधिकार का प्रश्न नहीं, बल्कि समाज के आधारभूत ढांचे पर संकट है। चीन की भूमिका: रणनीतिक उकसावा या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप? China’s Role: Strategic Provocation or Indirect Intervention? चीन दक्षिण एशिया में सीधे सैन्य या आर्थिक आक्रमण नहीं करता, लेकिन उसकी भूमिका कई परतों में दिखाई देती है: सैन्य और भू-राजनीतिक दबाव:    * भारत और पाकिस्तान में सीमाओं पर तनाव,    * गल...

The Return of the Cold War Cycle: A Weak Russia, a Cautious China, and an Isolated India

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  शीत युद्ध की वापसी का चक्र : कमजोर रूस, सतर्क चीन और घिरता भारत Introduction: History Does Not Repeat, It Rhymes प्रस्तावना : इतिहास खुद को नहीं दोहराता, वह तुक बनाता है The Return of the Cold War विश्व राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ 20वीं सदी की स्मृतियाँ लौटती हुई प्रतीत होती हैं। प्रत्यक्ष युद्धों के स्थान पर प्रॉक्सी संघर्ष, आर्थिक दबाव, तकनीकी वर्चस्व की होड़ और वैचारिक प्रचार—यह सब किसी नए युग की नहीं, बल्कि शीत युद्ध की संशोधित वापसी की पहचान है। फर्क केवल इतना है कि आज का शीत युद्ध न तो स्पष्ट गुटों में बँटा है और न ही शक्तियाँ वैसी हैं जैसी सोवियत संघ और अमेरिका के दौर में थीं। आज रूस कमजोर है, चीन अमेरिका के सामने प्रत्यक्ष मोर्चा खोलने से बच रहा है, अमेरिका और चीन प्रतिद्वंद्वी होते हुए भी कई स्तरों पर सहयोगी हैं, और भारत स्वयं को विरोधी या उदासीन शक्तियों से घिरा हुआ पाता है। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें दक्षिण एशिया एक बार फिर वैश्विक राजनीति की प्रयोगशाला बनता दिख रहा है। The Nature of the New Cold War नए शीत युद्ध की प्रकृति नया शीत युद्ध पारंप...