Bangladesh: Delusion and Reality

 **बांग्लादेश: विभ्रम और यथार्थ


**भूमिका: एक राष्ट्र, दो मानसिकताएँ

Introduction: One Nation, Two Mindsets**

हर राष्ट्र का इतिहास केवल घटनाओं से नहीं बनता, वह उसकी सामूहिक मानसिकता से गढ़ा जाता है। बांग्लादेश आज जिस दौर से गुजर रहा है, वह किसी आर्थिक सूचकांक या राजनीतिक सत्ता परिवर्तन से अधिक, एक वैचारिक संघर्ष का दौर है। यह संघर्ष है—विभ्रम और यथार्थ के बीच। एक ओर वह यथार्थ है जो गरीबी, बेरोज़गारी, शिक्षा की गिरावट, सामाजिक असमानता और संस्थागत कमजोरियों के रूप में सामने खड़ा है। दूसरी ओर वह विभ्रम है, जिसे धर्म, राष्ट्रवाद और भावनात्मक गौरव के आवरण में इतना सुसज्जित कर दिया गया है कि वही सत्य प्रतीत होने लगा है।

समस्या यह नहीं कि बांग्लादेश के पास संसाधन नहीं हैं या उसकी जनता में क्षमता का अभाव है। समस्या यह है कि उसके समाज और विशेषकर उसके युवा वर्ग को वास्तविक समस्याओं से हटाकर काल्पनिक शत्रुओं और भावनात्मक नारों में उलझा दिया गया है। यही विभ्रम बांग्लादेश के वर्तमान और भविष्य के बीच सबसे बड़ी दीवार बन चुका है।

**विभ्रम की उत्पत्ति: यह भ्रम आया कहाँ से?

Origin of Delusion: Where Did the Illusion Come From?**

विभ्रम कभी अचानक पैदा नहीं होता। वह धीरे-धीरे सामाजिक चेतना में रोपा जाता है। बांग्लादेश के संदर्भ में यह विभ्रम तीन स्रोतों से विकसित हुआ—

पहला, धार्मिक भावुकता का राजनीतिक उपयोग।

दूसरा, औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक असुरक्षा।

तीसरा, शिक्षा और संस्थाओं की कमजोरी।

जब किसी समाज में नागरिक को यह सिखाया जाए कि उसकी पहचान उसके कौशल या नागरिक कर्तव्य से नहीं, बल्कि केवल धार्मिक या सामूहिक पहचान से तय होगी, तब यथार्थ स्वतः ही गौण हो जाता है। बांग्लादेशी समाज में यही हुआ। धार्मिक पहचान को सुरक्षा-कवच बना दिया गया और हर असफलता को बाहरी साज़िश घोषित कर दिया गया।

**विभ्रम का मनोविज्ञान

Psychology of Delusion**

विभ्रम मनुष्य को इसलिए प्रिय होता है क्योंकि वह उसे जिम्मेदारी से मुक्त कर देता है। बांग्लादेशी समाज में यह मनोविज्ञान गहराई से बैठ चुका है।

यह विभ्रम व्यक्ति से कहता है—

तुम असफल नहीं हो, दुनिया अन्यायी है

तुम पिछड़े नहीं हो, तुम्हें दबाया जा रहा है

प्रश्न मत करो, विश्वास रखो

यह सोच आत्म-संतोष देती है, लेकिन आत्म-सुधार नहीं। परिणामस्वरूप समाज अपनी कमजोरियों को पहचानने की क्षमता खो देता है। यही वह बिंदु है जहाँ राष्ट्र ठहर जाते हैं और इतिहास आगे निकल जाता है।

**यथार्थ: जो दिखता है, पर स्वीकार नहीं होता

Reality: Visible Yet Unaccepted**

बांग्लादेश का यथार्थ न तो छिपा हुआ है और न ही अस्पष्ट। वह हर गली, हर गाँव और हर शहर में दिखाई देता है।

यथार्थ यह है कि—

युवाओं में बेरोज़गारी व्यापक है

शिक्षा की गुणवत्ता असमान और कमजोर है

महिलाओं की स्वतंत्रता सीमित है

अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस करते हैं

संस्थाएँ व्यक्तियों पर निर्भर होती जा रही हैं

यह यथार्थ असुविधाजनक है क्योंकि यह जवाब माँगता है। यह पूछता है कि नीति कहाँ विफल हुई, नेतृत्व ने क्या किया, और समाज ने क्या सहा। विभ्रम इन सवालों को “षड्यंत्र” कहकर खारिज कर देता है।

**युवा वर्ग: शक्ति या भीड़

Youth: Power or Crowd**

किसी भी राष्ट्र में युवा वर्ग परिवर्तन का वाहक होता है। लेकिन बांग्लादेश में यही युवा वर्ग अक्सर भावनात्मक भीड़ में बदलता दिखाई देता है।

युवा को—

इतिहास का चयनित संस्करण दिया जाता है

भावनात्मक गौरव सिखाया जाता है

आलोचना को अपमान बताया जाता है

इस प्रक्रिया में युवा अपनी ऊर्जा का उपयोग नवाचार, शोध या उद्यमिता में नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया और उन्माद में करता है। यह परिवर्तन नहीं, क्षरण की स्थिति है।

**धर्म और यथार्थ के बीच खिंची रेखा

Religion and the Line Between Faith and Reality**

धर्म अपने मूल में नैतिकता और आत्म-अनुशासन का माध्यम होता है। लेकिन जब धर्म यथार्थ से भागने का साधन बन जाए, तब वह विभ्रम का रूप ले लेता है।

बांग्लादेश में—

आस्था को प्रश्न से ऊपर रखा गया

आलोचना को अधार्मिक कहा गया

सुधार को विदेशी प्रभाव बताया गया

इससे धर्म आत्मोन्नति का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक जड़ता का माध्यम बन गया। यथार्थ को स्वीकार करने के लिए जिस साहस की आवश्यकता होती है, वह इस प्रक्रिया में कुंद हो गया।

**राजनीति: विभ्रम की संरक्षक

Politics as the Guardian of Delusion**

राजनीति का कार्य यथार्थ से संवाद करना होता है, लेकिन जब राजनीति स्वयं यथार्थ से डरने लगे, तब वह विभ्रम को शरण देती है। बांग्लादेशी राजनीति में यही परिघटना स्पष्ट दिखाई देती है।

राजनीति—

भावनात्मक मुद्दों को हवा देती है

वास्तविक सुधारों से बचती है

भीड़ को नागरिकों पर प्राथमिकता देती है

इससे लोकतंत्र प्रक्रिया बनकर रह जाता है, मूल्य नहीं। नागरिक मतदाता तो बनता है, लेकिन जिम्मेदार सहभागी नहीं।

**अल्पसंख्यक और यथार्थ का आईना

Minorities as the Mirror of Reality**

किसी भी समाज का यथार्थ उसके अल्पसंख्यकों की स्थिति में सबसे स्पष्ट दिखता है। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के प्रति असुरक्षा और अविश्वास इस बात का संकेत है कि समाज भीतर से कितना आश्वस्त या भयभीत है।

जब बहुसंख्यक समाज अपने अस्तित्व को लेकर आश्वस्त होता है, तब वह विविधता को स्वीकार करता है। जब वह भयभीत होता है, तब विभ्रम उसे सहारा देता है और अल्पसंख्यक निशाना बनते हैं।

**महिलाएँ: विभ्रम का सबसे बड़ा शिकार

Women: The Biggest Victims of Delusion**

विभ्रम का सबसे गहरा असर महिलाओं पर पड़ता है। जब समाज यथार्थ से भागता है, तब नियंत्रण सबसे पहले स्त्रियों पर कसा जाता है।

बांग्लादेशी समाज में—

महिला शिक्षा को सीमाओं में बाँधा जाता है

स्वतंत्रता को नैतिक संकट बताया जाता है

समानता को सांस्कृतिक खतरा कहा जाता है

यह सब यथार्थ से नहीं, विभ्रम से उपजता है। क्योंकि यथार्थ यह स्वीकार करता है कि समाज की प्रगति महिलाओं की स्वतंत्रता से जुड़ी है।

**भारत और बाहरी शत्रु का विभ्रम

India and the Illusion of External Enemy**

विभ्रम को जीवित रखने के लिए एक बाहरी शत्रु आवश्यक होता है। बांग्लादेशी विमर्श में यह भूमिका अक्सर भारत निभाता है।

इससे—

आंतरिक विफलताओं पर पर्दा पड़ता है

भावनात्मक एकता बनाई जाती है

आलोचना को देशद्रोह कहा जाता है

लेकिन इतिहास गवाह है—जो राष्ट्र अपने पड़ोसी से अधिक अपने भीतर के यथार्थ से डरते हैं, वे आगे नहीं बढ़ पाते।

**विभ्रम बनाम यथार्थ: ऐतिहासिक सबक

Delusion vs Reality: Lessons from History**

इतिहास बार-बार यह सिद्ध करता है कि विभ्रम पर टिका समाज स्थायी नहीं होता। चाहे वह साम्राज्य हों या आधुनिक राष्ट्र—जो यथार्थ से मुँह मोड़ते हैं, वे समय के साथ स्वयं टूट जाते हैं।

यथार्थ कठोर है, लेकिन वही सुधार की नींव बनता है। विभ्रम मधुर है, लेकिन वह समाज को धीरे-धीरे खोखला कर देता है।

**क्या यथार्थ की ओर वापसी संभव है?

Is a Return to Reality Possible?**

हाँ, लेकिन इसके लिए—

शिक्षा में आलोचनात्मक सोच

धर्म में नैतिक आत्मचिंतन

राजनीति में जवाबदेही

युवाओं में नागरिक चेतना

की आवश्यकता है।

यह परिवर्तन ऊपर से थोपा नहीं जा सकता। यह समाज के भीतर से जन्म लेता है।

**निष्कर्ष: राष्ट्र का चुनाव

Conclusion: The Nation’s Choice**

बांग्लादेश आज एक ऐतिहासिक चुनाव के सामने खड़ा है। या तो वह विभ्रम को अपनी पहचान बनाए रखे—जहाँ भावनाएँ यथार्थ पर भारी रहें। या फिर वह यथार्थ का सामना करे—जहाँ प्रश्न पूछे जाएँ, उत्तर माँगे जाएँ और सुधार स्वीकार किए जाएँ।

राष्ट्र वही आगे बढ़ते हैं जो अपने यथार्थ से आँख मिलाने का साहस रखते हैं।

जो विभ्रम को ही यथार्थ मान लेते हैं, वे इतिहास में केवल चेतावनी बनकर रह जाते हैं।

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