Silence of Buddhist Nations and China’s Tibet Policy
दुनिया के बौद्ध देशों की चुप्पी और चीन की तिब्बत नीति
Silence of Buddhist Nations and China’s Tibet Policy
भूमिका | Introduction
बौद्ध धर्म को सामान्यतः करुणा, अहिंसा, सहअस्तित्व और नैतिक साहस का दर्शन माना जाता है। गौतम बुद्ध का संदेश केवल आत्म-मुक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि वह अन्याय, दमन और सत्ता के अहंकार के विरुद्ध एक मौन लेकिन दृढ़ प्रतिरोध भी था। इसके बावजूद आज जब तिब्बत जैसे बौद्ध सभ्यता के मूल केंद्र पर राज्य-प्रायोजित नियंत्रण, सांस्कृतिक क्षरण और धार्मिक दमन जारी है, तब दुनिया के अधिकांश बौद्ध-बहुल देश लगभग पूर्ण चुप्पी साधे हुए हैं। यह चुप्पी साधारण कूटनीतिक विवशता नहीं, बल्कि एक गहरे नैतिक और वैचारिक संकट का संकेत है।
तिब्बत: बौद्ध सभ्यता की आत्मा | Tibet: The Soul of Buddhist Civilization
तिब्बत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं रहा है। सदियों तक वह महायान और वज्रयान बौद्ध परंपरा का जीवंत केंद्र रहा, जहाँ धर्म केवल आस्था नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक जीवन का आधार था। मठ शिक्षा के केंद्र थे, लामा नैतिक मार्गदर्शक थे और दलाई लामा की संस्था आध्यात्मिक नेतृत्व का प्रतीक थी। तिब्बती समाज आधुनिक राष्ट्र-राज्य की परिभाषा में भले न फिट बैठे, लेकिन उसकी सभ्यतागत परिपक्वता असंदिग्ध थी। इसी कारण तिब्बत पर नियंत्रण केवल भूमि पर अधिकार नहीं, बल्कि एक पूरी जीवन-पद्धति पर हस्तक्षेप था।
चीन का तिब्बत पर नियंत्रण: ‘मुक्ति’ या उपनिवेश? | China’s Control: Liberation or Colonization?
1950 के बाद चीन ने तिब्बत को “शांतिपूर्ण मुक्ति” के नाम पर अपने अधीन किया, लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट होता गया कि यह मुक्ति नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित नियंत्रण प्रक्रिया थी। चीन की तिब्बत नीति का मूल उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता को स्वीकार करना नहीं, बल्कि उसे राज्य के अधीन करना रहा है। मठों में सरकारी निगरानी, भिक्षुओं के लिए वैचारिक प्रशिक्षण, दलाई लामा के प्रभाव को सीमित करने के प्रयास और यहाँ तक कि पुनर्जन्म जैसी आध्यात्मिक प्रक्रिया में भी राज्य की भूमिका तय करना—ये सभी कदम इस बात का संकेत हैं कि चीन तिब्बत को केवल भौगोलिक रूप से नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से भी अपने ढाँचे में ढालना चाहता है।
सांस्कृतिक समाहार नीति | Cultural Assimilation Policy
इस नियंत्रण के साथ-साथ सांस्कृतिक समाहार की नीति भी समानांतर रूप से चलती रही है। तिब्बती भाषा को शिक्षा व्यवस्था से धीरे-धीरे बाहर करना, मंदारिन को अनिवार्य बनाना और इतिहास की नई व्याख्या प्रस्तुत करना केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि पहचान के पुनर्निर्माण की कोशिश है। जब किसी समाज की भाषा और स्मृति बदली जाती है, तो उसका प्रतिरोध भी कमजोर पड़ता है। यही कारण है कि तिब्बत में विरोध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि अस्तित्वगत बन गया है।
जनसांख्यिकीय परिवर्तन | Demographic Changes
जनसांख्यिकीय परिवर्तन इस नीति का तीसरा और सबसे निर्णायक पहलू है। हान चीनी आबादी का योजनाबद्ध बसाव तिब्बतियों को उनके ही भूभाग में हाशिये पर धकेलता है। आर्थिक अवसर, प्रशासनिक पद और शहरी विकास का लाभ बाहरी आबादी को मिलना तिब्बतियों में धीरे-धीरे बेगानापन पैदा करता है। यह वही मॉडल है जो चीन ने अन्य क्षेत्रों में भी अपनाया है, जहाँ सांस्कृतिक भिन्नता को दीर्घकालिक चुनौती माना गया।
बौद्ध देशों की चुप्पी: डर, लालच या वैचारिक पतन? | Silence of Buddhist Nations
यह सबसे केंद्रीय प्रश्न है। श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस, जापान और कोरिया जैसे देश, जिनकी सांस्कृतिक पहचान बौद्ध परंपरा से गहराई से जुड़ी है, तिब्बत के प्रश्न पर सार्वजनिक रूप से बोलने से बचते रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण चीन के साथ उनकी आर्थिक और रणनीतिक निर्भरता है। निवेश, व्यापार, पर्यटन और बुनियादी ढाँचे के नाम पर बना यह संबंध इतना गहरा हो चुका है कि नैतिक असहमति को “जोखिम” माना जाने लगा है। इस चुप्पी के पीछे केवल डर नहीं, बल्कि आधुनिक राजनीति का यथार्थवाद भी है। तिब्बत पर बोलना चीन के “आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप” के आरोप को आमंत्रित करता है, जिससे कूटनीतिक संबंध प्रभावित हो सकते हैं। परिणामस्वरूप बौद्ध देश एक सुरक्षित रास्ता चुनते हैं—न समर्थन, न विरोध, केवल मौन। लेकिन यह मौन धीरे-धीरे बौद्ध दर्शन की आत्मा के विपरीत खड़ा दिखाई देता है।
धर्म का राष्ट्रवादी अपहरण | Nationalization of Buddhism
इस स्थिति को और जटिल बनाता है बौद्ध धर्म का राष्ट्रवादी रूपांतरण। कई देशों में बौद्ध धर्म अब आध्यात्मिक मार्गदर्शन से अधिक राष्ट्रीय पहचान का औज़ार बन चुका है। जब धर्म सत्ता की वैधता से जुड़ जाता है, तब वह अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की क्षमता खो देता है। तिब्बत के मामले में यही हुआ है—करुणा का दर्शन राजनीतिक सुविधा के आगे पीछे हट गया है।
दलाई लामा: वैश्विक सम्मान, राजनीतिक उपेक्षा | Dalai Lama: Revered, Yet Avoided
दलाई लामा इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा प्रतीक हैं। विश्व स्तर पर सम्मानित, नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और अहिंसा के वैश्विक प्रवक्ता होने के बावजूद, उन्हें बौद्ध देशों की सरकारें औपचारिक दूरी से देखती हैं। आमंत्रण टाले जाते हैं, संयुक्त मंच नहीं बनते और समर्थन निजी सहानुभूति तक सीमित रह जाता है। यह आध्यात्मिक नेतृत्व की नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की विफलता है।
तिब्बत का व्यापक महत्व | Broader Significance of Tibet
तिब्बत का प्रश्न केवल तिब्बत तक सीमित नहीं है। यह एक परीक्षण है कि आधुनिक विश्व में सांस्कृतिक और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या है। यदि तिब्बत में धर्म नियंत्रित हो सकता है, संस्कृति बदली जा सकती है और पहचान को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर पुनर्परिभाषित किया जा सकता है, तो यह मॉडल कहीं भी लागू हो सकता है। यही कारण है कि तिब्बत की चुप्पी भविष्य की कई चुप्पियों का आधार बनती है।
भारत की स्थिति: नैतिक समर्थन बनाम रणनीतिक मौन | India’s Moral Dilemma
भारत इस संदर्भ में एक विशेष स्थिति में है। दलाई लामा को शरण देना और तिब्बती निर्वासित समुदाय को स्थान देना नैतिक साहस का उदाहरण रहा है, लेकिन समय के साथ भारत की भाषा भी अधिक सतर्क और सीमित हुई है। तिब्बत अब मुख्यतः सीमा और रणनीति के संदर्भ में देखा जाने लगा है, न कि सभ्यतागत प्रश्न के रूप में। यह दिखाता है कि लोकतंत्र भी अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन से अछूता नहीं रहता।
बौद्ध दर्शन बनाम बौद्ध राजनीति | Buddhist Philosophy vs Buddhist Politics
बुद्ध ने करुणा को निष्क्रिय सहानुभूति नहीं, बल्कि साहसिक नैतिकता के रूप में प्रस्तुत किया था। आज जब तिब्बत के संदर्भ में वही करुणा मौन में बदल जाती है, तो यह केवल चीन की सफलता नहीं, बल्कि बौद्ध नैतिकता की सामूहिक विफलता भी है। इतिहास अक्सर उन लोगों को कठोरता से याद करता है जो अन्याय के समय चुप रहे। दुनिया के बौद्ध देशों की यह चुप्पी भी एक दिन इसी कसौटी पर परखी जाएगी। प्रश्न यह नहीं होगा कि चीन कितना शक्तिशाली था, बल्कि यह कि क्या बुद्ध के अनुयायी अपने ही संदेश के साथ खड़े हो पाए थे या नहीं।
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