Bangladeshi Youth Living Under the Shadow of Delusion**
भ्रम के साये में जीता बांग्लादेशी युवा
किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं में बसता है—यह कथन जितना प्रचलित है, उतना ही कठोर भी। क्योंकि यदि युवा चेतनाहीन हो जाए, तो भविष्य स्वयं अंधकार बन जाता है। बांग्लादेश आज इसी ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। जनसंख्या के स्तर पर युवा बहुल यह देश वैचारिक रूप से एक ऐसे दौर में फँसा हुआ है जहाँ भ्रम, अंधविश्वास, धार्मिक उन्माद और बौद्धिक जड़ता ने विवेक और वैज्ञानिक सोच को लगभग अपदस्थ कर दिया है।
बांग्लादेशी युवा केवल बेरोज़गारी, गरीबी या राजनीतिक अस्थिरता से नहीं जूझ रहा, बल्कि वह एक सुनियोजित मानसिक निर्माण का शिकार है—जहाँ उसे सोचने से पहले मानने और प्रश्न करने से पहले डरने की शिक्षा दी जाती है। यही कारण है कि यह युवा वर्ग परिवर्तन की शक्ति बनने के बजाय, अक्सर यथास्थिति और उन्माद का वाहक बनता दिखाई देता है।
**जनसांख्यिकीय शक्ति या सामाजिक बोझ
Demographic Power or Social Burden**
बांग्लादेश की लगभग 60 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यह आँकड़ा अपने आप में विकास का संकेत हो सकता था, यदि इसके साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार के अवसर और वैचारिक स्वतंत्रता जुड़ी होती। किंतु वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है।
यहाँ युवा—
संख्या में तो बहुत हैं
पर दिशा में नहीं
ऊर्जा में प्रचुर हैं
पर उद्देश्य में नहीं
जब युवा को केवल धार्मिक पहचान, भावनात्मक उन्माद और बाहरी शत्रु की कहानियों में उलझा दिया जाता है, तब वह राष्ट्र निर्माण का औज़ार नहीं, बल्कि भीड़-राजनीति का संसाधन बन जाता है।
**अंधविश्वास: आस्था से आगे सत्ता की रणनीति
Superstition: From Faith to a Strategy of Control**
बांग्लादेशी समाज में अंधविश्वास केवल धार्मिक भावना का परिणाम नहीं है, बल्कि यह सत्ता और नियंत्रण का एक सशक्त माध्यम है। यहाँ अंधविश्वास को व्यवस्थित रूप से पोषित किया गया है।
युवा को सिखाया जाता है—
बीमारी ईश्वर की मर्जी है, व्यवस्था की विफलता नहीं
गरीबी सब्र की परीक्षा है, नीति की असफलता नहीं
अन्य धर्म या राष्ट्र दुश्मन हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं
इस प्रक्रिया में युवा अपने जीवन की असफलताओं का कारण अपने समाज या तंत्र में खोजने के बजाय, अदृश्य शक्तियों और कथित साजिशों में ढूँढता है। यही भ्रम उसे विद्रोही नहीं, बल्कि आज्ञाकारी बनाता है।
**मदरसा शिक्षा और बौद्धिक सीमाबद्धता
Madrasa Education and Intellectual Confinement**
बांग्लादेश की शिक्षा व्यवस्था एक गहरे वैचारिक विभाजन से ग्रस्त है। एक ओर सीमित आधुनिक शिक्षा संस्थान हैं, दूसरी ओर विशाल मदरसा नेटवर्क।
मदरसा आधारित शिक्षा—
आधुनिक विज्ञान को गौण बनाती है
इतिहास को धार्मिक चश्मे से दिखाती है
आलोचनात्मक सोच को अवज्ञा मानती है
इस व्यवस्था से निकला युवा नागरिक नहीं, बल्कि वैचारिक अनुयायी होता है। वह तर्क करना नहीं सीखता, बल्कि आदेश मानना सीखता है। परिणामस्वरूप समाज में स्वतंत्र सोच रखने वाले व्यक्तियों की संख्या घटती जाती है।
**सोशल मीडिया: आधुनिक तकनीक, पुरानी चेतना
Social Media: Modern Technology, Ancient Mindset**
यह मान लेना एक बड़ी भूल है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया अपने आप समाज को प्रगतिशील बना देते हैं। बांग्लादेश इसका सटीक उदाहरण है।
यहाँ सोशल मीडिया—
अफवाहों का कारखाना है
धार्मिक भावनाओं का विस्फोटक है
भीड़ उकसाने का मंच है
युवा बिना सत्यापन, बिना संदर्भ, केवल भावनाओं के आधार पर प्रतिक्रिया करता है। डिजिटल माध्यमों ने ज्ञान नहीं, बल्कि उन्माद की गति बढ़ा दी है।
**राजनीति में युवा: भागीदार नहीं, मोहरा
Youth in Politics: Pawn, Not Participant**
बांग्लादेशी राजनीति में युवा वर्ग की भूमिका अत्यंत विडंबनापूर्ण है। वह हर आंदोलन में आगे है, लेकिन हर निर्णय से बाहर है।
युवा—
चुनावी भीड़ है
विरोध प्रदर्शनों की ताकत है
हिंसक संघर्षों का अग्रदूत है
परंतु—
नीति निर्माण में उसका कोई स्थान नहीं
सत्ता संरचना में उसकी कोई आवाज़ नहीं
राजनीतिक दल युवाओं को विचारशील नागरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक सैनिक के रूप में गढ़ते हैं।
**अल्पसंख्यक विरोध और सामूहिक मानसिकता
Minority Hostility and Collective Psychology**
बांग्लादेशी युवाओं में अल्पसंख्यकों के प्रति अविश्वास केवल सामाजिक नहीं, बल्कि संस्थागत है। यह अविश्वास—
शिक्षा
धार्मिक उपदेश
राजनीतिक बयानबाज़ी
के माध्यम से लगातार पोषित किया जाता है।
युवा यह नहीं पूछता कि विविधता समाज को कमजोर क्यों करेगी। उसे केवल यह बताया जाता है कि “अलग” होना खतरा है। यह मानसिकता अंततः समाज को अंदर से खोखला कर देती है।
**वैश्विक इस्लामी राजनीति का प्रभाव
Influence of Global Islamic Politics**
मध्य पूर्व और वैश्विक इस्लामी राजनीति की प्रतिध्वनि बांग्लादेशी युवाओं तक पहुँचती है। इससे एक स्थायी भावनात्मक ढाँचा बनता है—
हम हमेशा पीड़ित हैं
दुनिया हमारे खिलाफ है
हिंसा आत्मरक्षा है
यह सोच युवाओं को अपने समाज की समस्याओं से दूर ले जाती है और उन्हें एक काल्पनिक वैश्विक संघर्ष का हिस्सा बना देती है।
**महिला प्रश्न और युवा सोच
Women Question and Youth Mindset**
अंधविश्वास और धार्मिक जड़ता का सबसे गहरा प्रभाव महिलाओं पर पड़ता है। युवा समाज में—
महिला शिक्षा को संदेह से देखा जाता है
स्वतंत्रता को नैतिक पतन कहा जाता है
समानता को विदेशी साजिश बताया जाता है
दुखद यह है कि कई युवा महिलाएँ भी इसी सोच को अपना लेती हैं। जब दमन को धर्म का नाम मिल जाए, तब वह सबसे स्थायी बन जाता है।
**भारत-विरोध और भ्रमित राष्ट्रचेतना
India-Hatred and Distorted National Consciousness**
बांग्लादेशी युवाओं को भारत के प्रति एक स्थायी संदेह और विरोध की शिक्षा दी जाती है। इतिहास के वे अध्याय जो सहयोग और साझे संघर्ष की बात करते हैं, उन्हें या तो दबा दिया जाता है या तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है।
इससे युवा—
आत्मनिर्भर राष्ट्रवाद नहीं
बल्कि प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद
सीखता है, जो केवल विरोध में जीता है, निर्माण में नहीं।
**क्या पूरा युवा वर्ग दोषी है?
Is the Entire Youth to Blame?**
नहीं।
बांग्लादेश में आज भी विवेकशील, प्रगतिशील और साहसी युवा मौजूद हैं। वे—
सवाल पूछते हैं
सत्ता से टकराते हैं
कट्टरता को चुनौती देते हैं
लेकिन उनकी संख्या कम है और जोखिम बहुत बड़ा। भ्रम का शोर विवेक की आवाज़ को दबा देता है।
**निष्कर्ष: युवा शक्ति या उन्मादी भीड़
Conclusion: Youth Power or Frenzied Mob**
बांग्लादेशी युवा आज इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। या तो वह—
विवेक
विज्ञान
मानवता
का मार्ग चुने,
या फिर—
भ्रम
अंधविश्वास
उन्माद
का।
यदि वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही, तो बांग्लादेश युवा राष्ट्र नहीं, बल्कि अंधविश्वासी भीड़ का समाज बन जाएगा। और इतिहास बार-बार यह सिद्ध कर चुका है कि भीड़ कभी राष्ट्र नहीं बनाती—वह केवल विनाश की दिशा तय करती है।
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