गांधी, विश्व कूटनीति और भारतीय विदेश नीति : भीड़, बुद्धिजीवी और भटकता नागरिक

 

भारतीय विदेश नीति आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ दिशाएँ स्पष्ट नहीं हैं, किंतु शोर अत्यधिक है। एक ओर स्वघोषित बौद्धिकों की वह जमात है, जो हर अंतरराष्ट्रीय घटना को वैचारिक नहीं, बल्कि वैचारिक दिखने वाले सत्ता-समर्थक विमर्श में बदल देती है। दूसरी ओर ऐसे राजनीतिक राजकुमार हैं, जो एक ‘क्रुद्ध युवा’ की छवि गढ़कर विदेश नीति को भावनात्मक उकसावे, राष्ट्रवादी उत्तेजना और स्थायी आक्रोश के मंच में बदलने में व्यस्त हैं। तीसरी ओर दायित्व-मुक्त बुद्धिजीवी और यांत्रिक नौकरशाही है, जो नीति के नैतिक परिणामों से स्वयं को अलग रखकर केवल प्रक्रियागत शुद्धता में अपनी भूमिका सीमित कर लेना चाहती है।

इन सबकी ठीक विपरीत दिशा में खड़ा है—भकुआया हुआ भारत का आम नागरिक।

यह नागरिक न तो विदेश नीति की जटिलताओं को समझ पा रहा है, न ही उसे समझाने का कोई ईमानदार प्रयास हो रहा है। उसके हिस्से में आया है केवल शोर, नारे, भावनात्मक ध्रुवीकरण और भीड़ में शामिल होने का अभ्यास। वह “हूंवा-हूंवा” करती भीड़ का हिस्सा बनना जानता है, विचारशील नागरिक बने रहना नहीं।

यही वह बिंदु है जहाँ भारतीय विदेश नीति केवल कूटनीतिक संकट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना और नैतिक विवेक के संकट में प्रवेश कर चुकी है। इस संकट को समझने के लिए गांधी के वैश्विक कूटनीतिक दृष्टिकोण की पुनर्व्याख्या अनिवार्य हो जाती है।

1. गांधी की विश्व कूटनीति की अवधारणा : शक्ति नहीं, नैतिकता

महात्मा गांधी ने कभी विदेश मंत्रालय नहीं संभाला, न ही उन्होंने किसी अंतरराष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर किए। इसके बावजूद वे 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली वैश्विक कूटनीतिक व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं। इसका कारण यह है कि गांधी ने कूटनीति को शक्ति-संतुलन (Balance of Power) से निकालकर नैतिक संतुलन (Balance of Conscience) के क्षेत्र में स्थापित किया।

पश्चिमी यथार्थवादी कूटनीति का आधार रहा है—

सैन्य शक्ति

आर्थिक दबाव

रणनीतिक भय

गांधी ने इसके विपरीत यह स्थापित किया कि यदि कोई राष्ट्र या आंदोलन नैतिक रूप से सही पक्ष पर खड़ा हो, तो वैश्विक जनमत स्वयं उसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक शक्ति बन सकता है। गांधी की दृष्टि में कूटनीति का उद्देश्य दूसरे को पराजित करना नहीं, बल्कि अन्याय को नैतिक रूप से अस्वीकार्य बनाना था।

2. अहिंसा : आदर्शवाद नहीं, रणनीतिक यथार्थ

अहिंसा को अक्सर एक भावुक या अव्यावहारिक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जबकि गांधी के लिए अहिंसा एक दीर्घकालिक रणनीति थी। उन्होंने यह भली-भांति समझ लिया था कि हिंसा तात्कालिक विजय दिला सकती है, लेकिन स्थायी वैधता नहीं।

ब्रिटिश साम्राज्य सैन्य रूप से भारत से कहीं अधिक शक्तिशाली था, किंतु नैतिक रूप से वह लगातार कमजोर होता गया। यह कमजोरी गांधी की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता थी। उन्होंने युद्ध किए बिना साम्राज्य को आत्मरक्षा की स्थिति में ला खड़ा किया।

आज की भारतीय विदेश नीति जब स्वयं को “उत्तरदायी शक्ति” (Responsible Power) कहती है, तो वह अनजाने में गांधी की उसी रणनीतिक अहिंसा की विरासत का उपयोग कर रही होती है—भले ही व्यवहार में उससे दूर जाती दिखाई दे।

3. सत्याग्रह और वैश्विक जनमत की राजनीति

गांधी का सत्याग्रह आधुनिक भाषा में कहें तो—

नैतिक दबाव की राजनीति

सॉफ्ट पावर का प्रारंभिक रूप

नागरिक प्रतिरोध आधारित कूटनीति

उन्होंने यह स्थापित किया कि यदि पीड़ित पक्ष स्वयं हिंसा का सहारा न ले, तो आक्रामक पक्ष वैश्विक मंच पर नैतिक रूप से कटघरे में खड़ा हो जाता है। आज मानवाधिकार, जलवायु न्याय, उपनिवेशवाद-विरोध और वैश्विक दक्षिण की राजनीति इसी सत्याग्रह की विस्तारित छायाएँ हैं।

भारत जब आज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्वयं को “वैश्विक दक्षिण की आवाज़” कहता है, तो यह गांधीवादी सत्याग्रह की आधुनिक व्याख्या ही है—हालाँकि व्यवहार में भारत कई बार उसी शक्ति-राजनीति में फँसता दिखता है, जिससे गांधी सावधान करते थे।

4. गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता की गांधीवादी जड़ें

गांधी ने कभी गुटनिरपेक्षता शब्द का प्रयोग नहीं किया, लेकिन उसका नैतिक आधार उन्हीं के विचारों में निहित है।

उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ था—

निर्णय लेने की स्वतंत्रता

किसी महाशक्ति की नैतिक गुलामी से मुक्ति

नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति और आज की “रणनीतिक स्वायत्तता” (Strategic Autonomy) वस्तुतः गांधी के इसी चिंतन की ऐतिहासिक निरंतरता हैं।

आज जब भारत किसी एक ध्रुव के साथ पूर्णतः खड़ा होने से बचता है, तो यह केवल रणनीति नहीं, बल्कि गांधीवादी विवेक का अवशेष है—हालाँकि उसे लगातार कमजोर किया जा रहा है।

5. स्वघोषित बौद्धिक और गांधी का नैतिक बौद्धिक

आज का भारतीय बौद्धिक वर्ग दो चरम सीमाओं में बँटा दिखता है—

एक ओर सत्ता-समर्थक वैचारिक प्रवक्ता,

दूसरी ओर सत्ता-विरोध के नाम पर भीड़ की भाषा अपनाने वाले प्रतिक्रियावादी।

गांधी का बौद्धिक इससे भिन्न था। वह न सत्ता का एजेंट था, न भीड़ का। वह असुविधाजनक प्रश्न पूछता था, लोकप्रियता खोने को तैयार रहता था और नैतिक अकेलेपन को स्वीकार करता था।

आज विदेश नीति पर प्रश्न उठाना राष्ट्रविरोध घोषित कर दिया जाता है। यह स्थिति गांधी के नैतिक बौद्धिक की पूर्ण अनुपस्थिति का प्रमाण है।

6. क्रुद्ध युवा, उत्तेजना और विदेश नीति का सैन्यीकरण

समकालीन भारत में विदेश नीति को जानबूझकर “क्रुद्ध युवा” की छवि से जोड़ा जा रहा है। युद्ध, बदला और आक्रामकता को राष्ट्रवाद का पर्याय बना दिया गया है। यह प्रवृत्ति गांधी के चिंतन के पूर्णतः विपरीत है।

गांधी मानते थे कि क्रोध से संचालित समाज अल्पकालिक ऊर्जा तो पैदा कर सकता है, किंतु दीर्घकालिक नीति नहीं। विदेश नीति में क्रोध हमेशा किसी तीसरी शक्ति के हित में काम करता है—अक्सर हथियार उद्योग और महाशक्तियों के।

7. नौकरशाही, दायित्वहीनता और नैतिक पलायन

आधुनिक भारतीय विदेश नीति का एक गंभीर संकट है—नैतिक उत्तरदायित्व का लोप। निर्णय नेता लेते हैं, किंतु ज़िम्मेदारी विशेषज्ञों पर डाल दी जाती है। विशेषज्ञ ब्यूरोक्रेसी का हवाला देते हैं और ब्यूरोक्रेसी फाइलों का।

गांधी इस पूरी संरचना को अस्वीकार करते थे। उनके लिए हर निर्णय नैतिक था और हर परिणाम व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का विषय।

8. भकुआया हुआ नागरिक : लोकतंत्र का सबसे बड़ा नुकसान

आपकी भूमिका का सबसे गहरा सत्य यही है—आज का भारतीय नागरिक नागरिक नहीं, भीड़ का सदस्य बनता जा रहा है। वह विदेश नीति को क्रिकेट मैच, युद्ध को तमाशा और कूटनीति को ट्रोलिंग के स्तर पर समझने को मजबूर है।

गांधी जानते थे कि जब नागरिक सोचना छोड़ देता है, तब राष्ट्र केवल औपचारिक रूप से जीवित रहता है।

निष्कर्ष

गांधी आज भी विश्व कूटनीति के लिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे हमें यह याद दिलाते हैं कि शक्ति से राष्ट्र डर पैदा कर सकते हैं, लेकिन नैतिकता से ही इतिहास दिशा बदलता है।

भारतीय विदेश नीति यदि केवल शोर, क्रोध और भीड़ पर टिकेगी, तो वह आत्मा खो देगी। गांधी उस आत्मा का अंतिम नैतिक संदर्भ हैं।

गांधी बिना सत्ता के भी विश्व को दिशा दे सके—

आज सत्ता पाकर भी दिशा खो देना,

यही हमारे समय का सबसे बड़ा संकट है।

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