The Return of the Cold War Cycle: A Weak Russia, a Cautious China, and an Isolated India

 


शीत युद्ध की वापसी का चक्र : कमजोर रूस, सतर्क चीन और घिरता भारत


Introduction: History Does Not Repeat, It Rhymes

प्रस्तावना : इतिहास खुद को नहीं दोहराता, वह तुक बनाता है

The Return of the Cold War


विश्व राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ 20वीं सदी की स्मृतियाँ लौटती हुई प्रतीत होती हैं। प्रत्यक्ष युद्धों के स्थान पर प्रॉक्सी संघर्ष, आर्थिक दबाव, तकनीकी वर्चस्व की होड़ और वैचारिक प्रचार—यह सब किसी नए युग की नहीं, बल्कि शीत युद्ध की संशोधित वापसी की पहचान है। फर्क केवल इतना है कि आज का शीत युद्ध न तो स्पष्ट गुटों में बँटा है और न ही शक्तियाँ वैसी हैं जैसी सोवियत संघ और अमेरिका के दौर में थीं।

आज रूस कमजोर है, चीन अमेरिका के सामने प्रत्यक्ष मोर्चा खोलने से बच रहा है, अमेरिका और चीन प्रतिद्वंद्वी होते हुए भी कई स्तरों पर सहयोगी हैं, और भारत स्वयं को विरोधी या उदासीन शक्तियों से घिरा हुआ पाता है। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें दक्षिण एशिया एक बार फिर वैश्विक राजनीति की प्रयोगशाला बनता दिख रहा है।


The Nature of the New Cold War

नए शीत युद्ध की प्रकृति

नया शीत युद्ध पारंपरिक सैन्य टकराव पर आधारित नहीं है। यह एक बहु-आयामी संघर्ष है, जिसमें अर्थव्यवस्था, तकनीक, सूचना, साइबर स्पेस और कूटनीति प्रमुख हथियार हैं। आज कोई भी शक्ति पूर्ण युद्ध नहीं चाहती, क्योंकि वैश्वीकरण ने युद्ध की लागत को असहनीय बना दिया है।

इस शीत युद्ध में स्पष्ट मित्र और शत्रु नहीं हैं। आज का मित्र कल का प्रतिद्वंद्वी हो सकता है और आज का शत्रु किसी मुद्दे पर सहयोगी भी बन सकता है। यही अनिश्चितता इस नए दौर को अधिक खतरनाक बनाती है।


Russia: From Superpower to Strategic Survivor

रूस : महाशक्ति से रणनीतिक जीवित रहने की अवस्था तक

सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस कभी भी उस स्तर पर वापस नहीं आ सका, जहाँ वह अमेरिका का बराबरी का प्रतिद्वंद्वी बन सके। यूक्रेन युद्ध ने इस सच्चाई को और स्पष्ट कर दिया है। रूस के पास परमाणु हथियार हैं, लेकिन उसकी आर्थिक और तकनीकी क्षमता सीमित है।

रूस आज एक ऐसी शक्ति है जो व्यवस्था को बदलने की बजाय उसमें अपनी जगह बचाए रखने की कोशिश कर रही है। वह न तो अमेरिका को निर्णायक चुनौती दे सकता है और न ही चीन का संतुलन बन सकता है। यही कारण है कि रूस स्वयं को ‘न्यूट्रल’ दिखाने का प्रयास करता है, लेकिन उसकी यह न्यूट्रलिटी मजबूरी की उपज है, न कि रणनीतिक विकल्प।


China: Strategic Patience and Avoidance of Direct War

चीन : रणनीतिक धैर्य और प्रत्यक्ष युद्ध से परहेज़

चीन आज की वैश्विक राजनीति का सबसे चालाक खिलाड़ी है। वह जानता है कि अमेरिका से प्रत्यक्ष युद्ध उसकी आर्थिक प्रगति को दशकों पीछे धकेल सकता है। इसलिए चीन की नीति स्पष्ट है—टकराव नहीं, थकावट।

चीन अमेरिका से प्रतिस्पर्धा करता है, लेकिन पूर्ण संघर्ष से बचता है। ताइवान, दक्षिण चीन सागर और हिंद-प्रशांत में वह दबाव बनाए रखता है, लेकिन सीमा लांघने से बचता है। यह वही रणनीति है जिसे वह भारत के विरुद्ध भी अपनाता है—न युद्ध, न शांति।


United States: Managing Decline Through Controlled Rivalries

अमेरिका : नियंत्रित प्रतिस्पर्धा के माध्यम से गिरावट का प्रबंधन

अमेरिका आज भी दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य और वित्तीय शक्ति है, लेकिन उसका एकाधिकार समाप्त हो चुका है। वह अब विश्व का अकेला निर्णायक नहीं रहा। इसी कारण अमेरिका टकराव को नियंत्रित रखना चाहता है।

चीन के साथ अमेरिका का संबंध इसी विरोधाभास का उदाहरण है। दोनों देश प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन व्यापार, जलवायु और वैश्विक वित्त में एक-दूसरे पर निर्भर भी हैं। यही कारण है कि वे प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हैं और प्रतिस्पर्धा को सीमित दायरे में रखते हैं।


United States and China: Rivals but Also Partners

अमेरिका और चीन : प्रतिद्वंद्वी भी, साझेदार भी

यह नया शीत युद्ध का सबसे बड़ा विरोधाभास है। अमेरिका और चीन एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाज़ी करते हैं, लेकिन वैश्विक व्यवस्था को गिरने नहीं देते। दोनों जानते हैं कि पूर्ण टकराव से पूरी प्रणाली ध्वस्त हो सकती है।

इसलिए संघर्ष को तीसरे क्षेत्रों में स्थानांतरित किया जाता है—जहाँ जोखिम कम और लाभ अधिक हो। दक्षिण एशिया इसी रणनीति का स्वाभाविक क्षेत्र बनता जा रहा है।


India’s Strategic Dilemma

भारत की रणनीतिक दुविधा

भारत इस नए शीत युद्ध में किसी स्पष्ट गुट का हिस्सा नहीं है। वह अमेरिका के साथ सहयोग करता है, लेकिन पूरी तरह उसके खेमे में नहीं जाता। वह रूस से पुराने संबंध रखता है, लेकिन रूस अब वैसा समर्थक नहीं रहा। वह चीन से प्रतिस्पर्धा करता है, लेकिन पूर्ण टकराव नहीं चाहता।

यही संतुलन भारत की ताकत भी है और कमजोरी भी। संतुलन तब तक कारगर है, जब तक सभी पक्ष उसे स्वीकार करते हैं। लेकिन जब सभी पक्ष भारत को अपने-अपने हितों के अनुसार सीमित रखना चाहते हैं, तो यही संतुलन दबाव बन जाता है।


India Surrounded by Hostile or Ambivalent Powers

भारत : विरोधी और उदासीन शक्तियों से घिरा

भारत की पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान है, जो अब भी प्रॉक्सी युद्ध की नीति से पीछे नहीं हटा है। उत्तर में चीन है, जो दीर्घकालिक दबाव बनाए हुए है। वैश्विक मंच पर अमेरिका और यूरोप भारत के साथ हैं, लेकिन शर्तों के साथ।

रूस, जो कभी भारत का भरोसेमंद रणनीतिक साथी था, अब स्वयं कमजोर और सीमित है। वह भारत के पक्ष में खड़े होने की स्थिति में नहीं है। इस प्रकार भारत स्वयं को एक ऐसे वातावरण में पाता है जहाँ समर्थन अनिश्चित और विरोध स्थायी है।


The Risk of South Asia Becoming a Permanent Tension Zone

दक्षिण एशिया के स्थायी तनाव क्षेत्र बनने का खतरा

यदि यही स्थिति बनी रही, तो दक्षिण एशिया भी मध्य पूर्व की तरह स्थायी तनाव का क्षेत्र बन सकता है—जहाँ युद्ध कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होते और शांति कभी पूरी तरह स्थापित नहीं होती।

इस मॉडल में भारत को लगातार सतर्क रहना पड़ेगा, संसाधन सुरक्षा में झोंकने पड़ेंगे और विकास की गति प्रभावित होगी। यही वह स्थिति है जिसे वैश्विक शक्तियाँ भारत के संदर्भ में स्वीकार्य मानती हैं।


Can India Break Out of This Trap?

क्या भारत इस जाल से निकल सकता है?

भारत के पास अभी भी विकल्प हैं। पहला—आर्थिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता को वास्तविक रूप देना। दूसरा—आंतरिक एकता को राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार बनाना। तीसरा—बहुध्रुवीय कूटनीति को केवल सिद्धांत नहीं, व्यवहार बनाना।

भारत को यह समझना होगा कि कोई भी शक्ति स्थायी मित्र नहीं है। दीर्घकालिक सुरक्षा केवल आत्मबल, संतुलित कूटनीति और सामाजिक स्थिरता से ही संभव है।


Conclusion: A Cold War Era Without Certainties

निष्कर्ष : अनिश्चितताओं से भरा शीत युद्ध काल

दुनिया शीत युद्ध की ओर लौट रही है, लेकिन यह वापसी पुराने ढर्रे पर नहीं है। रूस कमजोर है, चीन सतर्क है, अमेरिका नियंत्रित प्रतिस्पर्धा चाहता है और भारत स्वयं को दबावों के चौराहे पर खड़ा पाता है।

इतिहास ने भारत को एक कठिन विकल्प दिया है—या तो वह स्थायी तनाव के इस चक्र में फँस जाए, या अपनी सभ्यतागत शक्ति और रणनीतिक विवेक के बल पर इससे बाहर निकलने का मार्ग खोजे। यही 21वीं सदी में भारत की सबसे बड़ी परीक्षा है।

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