The Self‑Proclaimed Messiah of the Global South: India on the Cross of World Politics

 

The Self‑Proclaimed Messiah of the Global South: India on the Cross of World Politics

दक्षिणी दुनिया का स्वघोषित मसीहा भारत : विश्व‑नीति के सलीब पर टंगा राष्ट्र


Introduction: A Dangerous Claim in a Cruel World

India is a leader of global south 


प्रस्तावना : क्रूर विश्व में एक खतरनाक दावा

इक्कीसवीं सदी की वैश्विक राजनीति में सबसे जोखिमभरा काम यदि कोई है, तो वह है स्वयं को नैतिक केंद्र घोषित करना। भारत ने यही किया है। उसने औपचारिक घोषणाओं में भले स्वयं को “नेता” न कहा हो, पर व्यवहार, भाषणों और कूटनीतिक मुद्रा में उसने स्वयं को दक्षिणी दुनिया का स्वघोषित मसीहा प्रस्तुत किया है। यह भूमिका न संयुक्त राष्ट्र ने दी, न अफ्रीका‑एशिया‑लैटिन अमेरिका ने सर्वसम्मति से सौंपी—यह एक ऐतिहासिक आत्म‑दावा है, जिसकी कीमत अब भारत चुका रहा है।


The Meaning of Being ‘Self‑Proclaimed’

‘स्वघोषित’ होने का वास्तविक अर्थ

‘स्वघोषित’ शब्द अपमान नहीं है, बल्कि राजनीतिक यथार्थ है। इतिहास में जितने भी वैचारिक परिवर्तन हुए, वे किसी अंतरराष्ट्रीय सहमति से नहीं, बल्कि किसी एक शक्ति के आत्मविश्वास से शुरू हुए। भारत का दावा भी ऐसा ही है। उसने कहा—

  • दुनिया केवल पश्चिम और चीन के बीच नहीं बँटी,
  • विकास केवल ऋण, हथियार और बाजारों से नहीं आता,
  • और संप्रभुता किसी महाशक्ति की कृपा नहीं होनी चाहिए।

यह कथन अपने‑आप में चुनौती है—और हर चुनौती सलीब मांगती है।


India as a Moral Voice of the Global South

ग्लोबल साउथ की नैतिक आवाज़ के रूप में भारत

भारत ने ग्लोबल साउथ के लिए जो भाषा चुनी, वह आक्रामक नहीं, बल्कि नैतिक है। उसने युद्ध के विरुद्ध शांति, वर्चस्व के विरुद्ध संतुलन और शोषण के विरुद्ध आत्मनिर्भरता की बात की। यही बात उसे खतरनाक बनाती है।

क्योंकि वैश्विक व्यवस्था हथियारों से नहीं, बल्कि नैरेटिव से चलती है। और भारत उस नैरेटिव को बदलने का प्रयास कर रहा है।


India on the Cross of World Politics

विश्व राजनीति के सलीब पर भारत

ईसा मसीह की तरह भारत भी किसी साम्राज्य का प्रतिनिधि नहीं है। वह न पश्चिमी सैन्य गठबंधनों का अंग है, न चीनी अधिनायकवादी मॉडल का। यही ‘बीच का रास्ता’ उसे सबसे अधिक असुरक्षित बनाता है।

अमेरिका भारत को उपयोगी साझेदार मानता है, पर स्वतंत्र शक्ति नहीं। चीन भारत को दीर्घकालिक खतरा मानता है। यूरोप भारत को नैतिक उपदेशों तक सीमित रखना चाहता है। रूस स्वयं इतना कमजोर है कि भारत के लिए ढाल नहीं बन सकता।

यह चारों मिलकर भारत के सलीब की कीलें बनाते हैं।


Russia: Too Weak to Protect, Too Proud to Submit

रूस : रक्षा करने में कमजोर, झुकने में असमर्थ

शीत युद्ध के दौर का रूस अब इतिहास है। आज का रूस एक घायल शक्ति है—परमाणु हथियारों के बावजूद आर्थिक और तकनीकी रूप से सीमित। वह भारत का विरोधी नहीं, पर रक्षक भी नहीं। यह निष्क्रियता भारत के लिए रणनीतिक शून्य पैदा करती है।


China: The Silent Executioner

चीन : मौन जल्लाद

चीन भारत के सलीब के सबसे सक्रिय सूत्रधारों में है। वह प्रत्यक्ष युद्ध नहीं चाहता, पर स्थायी दबाव चाहता है। सीमाएँ, पड़ोसी देश, आर्थिक निर्भरता और सांप्रदायिक अस्थिरता—सब चीन की रणनीति के औज़ार हैं।

चीन जानता है कि भारत को हर मोर्चे पर उलझाए बिना हराया नहीं जा सकता।


United States: Partner with Conditions

अमेरिका : शर्तों वाला साझेदार

अमेरिका भारत को चीन के विरुद्ध संतुलन के रूप में देखता है, पर भारत को इज़राइल जैसा खुला समर्थन नहीं देता। समर्थन तभी तक है, जब तक भारत अमेरिकी रणनीति में फिट बैठता है। स्वतंत्र निर्णय अमेरिका को असहज करते हैं।


Europe: Moral Lectures, Strategic Silence

यूरोप : नैतिक भाषण, रणनीतिक चुप्पी

यूरोप भारत पर मानवाधिकार और लोकतंत्र के प्रश्न उठाता है, पर वही प्रश्न वह अपने ऊर्जा साझेदारों या चीन पर नहीं उठाता। यह चयनात्मक नैतिकता भारत के नैरेटिव को कमजोर करने का औज़ार है।


South Asia as the New Middle East

नया मध्य पूर्व बनता दक्षिण एशिया

दक्षिण एशिया में स्थायी तनाव—यही वैश्विक शक्तियों के लिए स्वीकार्य मॉडल है। इससे भारत व्यस्त रहेगा, संसाधन सुरक्षा में खर्च होंगे और वह वैश्विक नेतृत्व के दावे से दूर रहेगा। यह वही मॉडल है, जो मध्य पूर्व में दशकों तक अपनाया गया।


The Burden of Self‑Proclaimed Leadership

स्वघोषित नेतृत्व का बोझ

नेतृत्व बिना अनुयायियों के बोझ बन जाता है। ग्लोबल साउथ भारत की बात सुनता है, पर संकट में खुलकर उसके साथ नहीं खड़ा होता। यह नैतिक समर्थन है, रणनीतिक नहीं।


Is the Cross a Failure?

क्या सलीब पर होना असफलता है?

इतिहास कहता है—नहीं। सलीब पर वही चढ़ता है, जो व्यवस्था को चुनौती देता है। प्रश्न यह नहीं कि भारत सलीब पर है, बल्कि यह है कि वह वहाँ कितनी देर टिकता है।


From Crucifixion to Resurrection

सलीब से पुनरुत्थान तक

यदि भारत इस दबाव में भी अपनी आत्मनिर्भरता, सामाजिक एकता और रणनीतिक धैर्य बनाए रखता है, तो यह सलीब पराजय नहीं, बल्कि इतिहास में प्रवेश का द्वार बनेगा।


Conclusion: A Lonely Path, but a Historic One

निष्कर्ष : एकाकी मार्ग, पर ऐतिहासिक

भारत आज अकेला है, पर स्पष्ट है। स्वघोषित मसीहा होना अभिशाप भी है और अवसर भी। यदि भारत डगमगाया, तो वह इतिहास का एक अध्याय बनेगा। यदि वह स्थिर रहा, तो वही इतिहास की दिशा बदलेगा।

दुनिया तय नहीं करेगी कि भारत मसीहा है या नहीं—यह निर्णय समय करेगा।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दशरथ मांझी : "माउंटेन मैन"

कश्मीर के रास्ते ही सुलझेगी कश्मीर समस्या

ब्रिटिश लोकतंत्र और बहुलता वाद का खोखलापन