India’s Decline in Global Diplomacy and the Illusion of Population Power
विश्वकूटनीति में पिछड़ता भारत और जनसंख्या का भ्रम
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| Global power |
आकांक्षा, आँकड़े और असमंजस
Introduction: Aspirations, Numbers, and Strategic Confusion
इक्कीसवीं सदी का भारत एक विचित्र आत्मविश्वास और गहरे असमंजस के बीच खड़ा है। विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या, नाममात्र GDP में शीर्ष पाँच अर्थव्यवस्थाओं में स्थान, अंतरिक्ष, डिजिटल और परमाणु क्षमताओं के दावे—इन सबके बावजूद भारत जब भी वैश्विक राजनीति के निर्णायक क्षण आते हैं, तो अक्सर प्रतिक्रिया देने वाला देश बनकर रह जाता है, दिशा तय करने वाला नहीं। यह विरोधाभास केवल नीति की समस्या नहीं, बल्कि दृष्टि की समस्या है। इसी पृष्ठभूमि में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि क्या भारत सचमुच विश्वकूटनीति में पिछड़ रहा है, और यदि हाँ, तो क्या केवल उसकी विशाल जनसंख्या उसे महाशक्ति बना सकती है।
महाशक्ति क्या होती है: भारतीय भ्रम बनाम वैश्विक यथार्थ
What Defines a Great Power: Indian Perception vs Global Reality
भारत में महाशक्ति की धारणा अब भी संख्या-प्रधान है। जनसंख्या, सेना की संख्या, मिसाइलों की रेंज और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में उपस्थिति—इन सबको शक्ति मान लिया जाता है। जबकि वैश्विक राजनीति में महाशक्ति की पहचान इससे कहीं अधिक जटिल और कठोर होती है। महाशक्ति वह होती है जो युद्ध और शांति दोनों की शर्तें तय कर सके, जो वैश्विक आर्थिक नियमों को प्रभावित करे, जो संकट के समय केवल बयान न दे बल्कि परिणाम सुनिश्चित करे। इस कसौटी पर भारत की स्थिति अभी “संभावित शक्ति” की है, न कि “निर्णायक शक्ति” की।
विश्वकूटनीति में भारत का वास्तविक पिछड़ापन
India’s Real Lag in Global Diplomacy
भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी दीर्घकालिक रणनीतिक अस्पष्टता है। शीतयुद्ध के समय गुटनिरपेक्षता एक स्पष्ट वैचारिक विकल्प था, लेकिन आज वही नीति निर्णय-टालने का बहाना बन गई है। चीन भारत की सीमाओं को चुनौती देता है, फिर भी भारत उसके साथ व्यापारिक निर्भरता बनाए रखता है। अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफ़िक का स्तंभ मानता है, पर भारत पूर्ण रणनीतिक साझेदारी से कतराता है। रूस भारत का पुराना मित्र है, लेकिन वह चीन के साथ खड़ा होकर भारत के हितों की अनदेखी करता है। यह त्रिकोण भारत को हर मंच पर “संतुलन साधने वाला” बना देता है, “दिशा तय करने वाला” नहीं।
आर्थिक शक्ति: आँकड़ों की चमक, प्रभाव की कमी
Economic Growth: Shiny Numbers, Weak Influence
भारत की आर्थिक वृद्धि वास्तविक है, लेकिन उसका वैश्विक प्रभाव सीमित है। महाशक्ति बनने के लिए केवल GDP का आकार पर्याप्त नहीं होता। आवश्यक होता है तकनीकी नेतृत्व, वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर नियंत्रण और मुद्रा-शक्ति। अमेरिका डॉलर के माध्यम से वैश्विक दबाव बनाता है, चीन उत्पादन और सप्लाई के माध्यम से, यूरोप नियमों और मानकों के माध्यम से। भारत अभी भी तकनीक में उपभोक्ता, रक्षा में आयातक और वित्त में आश्रित राष्ट्र है। यही कारण है कि उसकी आर्थिक शक्ति विश्वकूटनीति में दबाव का साधन नहीं बन पाती।
सैन्य क्षमता और रणनीतिक संकोच
Military Capability and Strategic Hesitation
भारत सैन्य दृष्टि से कमजोर नहीं है, लेकिन उसकी सैन्य शक्ति का राजनीतिक और कूटनीतिक प्रयोग सीमित है। भारत “संयम” को नैतिक श्रेष्ठता के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि वैश्विक राजनीति में संयम तभी प्रभावी होता है जब उसके पीछे स्पष्ट दंड-क्षमता हो। चीन सीमाओं पर यथास्थिति बदलता है, अमेरिका सैन्य तैनाती और प्रतिबंधों का प्रयोग करता है, तुर्की और ईरान क्षेत्रीय संतुलन को चुनौती देते हैं। भारत अक्सर बयान और अपील तक सीमित रह जाता है।
जनसंख्या: शक्ति का स्रोत या रणनीतिक भ्रम?
Population: Source of Power or Strategic Illusion?
भारत की जनसंख्या को उसका सबसे बड़ा हथियार बताया जाता है। लेकिन इतिहास और वर्तमान दोनों यह सिद्ध करते हैं कि जनसंख्या अपने आप में शक्ति नहीं होती। जनसंख्या तभी शक्ति बनती है जब वह शिक्षित, स्वस्थ, कुशल और उत्पादक हो। अन्यथा वही जनसंख्या बेरोज़गारी, सामाजिक तनाव और नीति-असमर्थता का कारण बन जाती है।
भारत की जनसंख्या: अवसर और खतरे का द्वंद्व
India’s Population: A Duality of Opportunity and Risk
भारत की युवा आबादी को जनसांख्यिकीय लाभांश कहा जाता है, लेकिन यह लाभांश स्वतः प्राप्त नहीं होता। शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य व्यवस्था और रोजगार की प्रकृति इसे तय करती है। भारत में शिक्षा का प्रसार हुआ है, पर उसका स्तर वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुकूल नहीं है। बड़ी संख्या में युवा डिग्रीधारी हैं, पर उच्च-मूल्य वाले कौशलों से वंचित हैं। यदि यह स्थिति बनी रही, तो यह विशाल जनसंख्या रणनीतिक संपदा नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर सौदेबाज़ी की कमजोरी बन जाएगी।
इतिहास की कठोर सीख
The Harsh Lessons of History
इतिहास स्पष्ट रूप से बताता है कि जनसंख्या कभी भी अकेले महाशक्ति का आधार नहीं रही। मध्यकालीन भारत जनसंख्या और संसाधनों में समृद्ध था, फिर भी राजनीतिक विखंडन के कारण विदेशी शासन का शिकार हुआ। अफ्रीका आज भी जनसंख्या में समृद्ध है, पर वैश्विक राजनीति में निर्णायक भूमिका नहीं निभा पाता। इसके विपरीत जापान और दक्षिण कोरिया ने सीमित जनसंख्या में भी शिक्षा, तकनीक और अनुशासन के बल पर वैश्विक प्रभाव हासिल किया।
जनसंख्या: ईंधन है, इंजन नहीं
Population Is Fuel, Not the Engine
जनसंख्या केवल ईंधन है। इंजन होता है—शिक्षा, नीति, अनुशासन और राष्ट्रीय दृष्टि। यदि इंजन कमजोर हो, तो अधिक ईंधन केवल अव्यवस्था पैदा करता है। भारत की चुनौती यही है कि वह अपनी जनसंख्या को भीड़ से मानव-पूँजी में बदले।
सभ्यतागत वैधता और ग्लोबल साउथ
Civilizational Legitimacy and the Global South
भारत की सबसे बड़ी अदृश्य शक्ति उसकी सभ्यतागत छवि है। वह औपनिवेशिक शोषक नहीं रहा, न ही वैचारिक साम्राज्यवादी। यही कारण है कि अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के कई देश भारत को नैतिक दृष्टि से स्वीकार करते हैं। यदि भारत इस वैधता को संगठित नीति में बदल सके, तो वह ग्लोबल साउथ का वास्तविक नेता बन सकता है।
भूगोल, लोकतंत्र और अधूरी संभावना
Geography, Democracy, and an Unfulfilled Promise
भारत का भौगोलिक स्थान उसे इंडो-पैसिफ़िक, पश्चिम एशिया और यूरेशिया के बीच स्वाभाविक धुरी बनाता है। लोकतंत्र और युवा समाज का संयोजन उसे वैचारिक रूप से विशिष्ट बनाता है। लेकिन इन सभी लाभों को रणनीतिक निर्णय में बदलने का साहस अभी अधूरा है।
महाशक्ति बनने की अनिवार्य शर्तें
Essential Preconditions for Becoming a Great Power
भारत को सबसे पहले अपनी जनसंख्या को गुणवत्ता में बदलना होगा। शिक्षा को डिग्री-उत्पादन से निकालकर रणनीतिक सोच और नवाचार से जोड़ना होगा। स्वास्थ्य को केवल कल्याण नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बनाना होगा। विदेश नीति में स्पष्टता और अर्थव्यवस्था में नियम-निर्माण की क्षमता विकसित करनी होगी। कूटनीति को केवल नौकरशाही प्रक्रिया नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श बनाना होगा।
निष्कर्ष: प्रश्न संसाधनों का नहीं, साहस का है
Conclusion: The Question Is Not Resources, but Courage
भारत के पास जनसंख्या है, भूगोल है, सभ्यता है और अवसर भी है। लेकिन महाशक्ति बनने के लिए सबसे आवश्यक तत्व अभी भी अधूरा है—निर्णय लेने का साहस। केवल जनसंख्या भारत को भीड़ बना सकती है, शक्ति नहीं। पर यदि वही जनसंख्या दृष्टि, गुणवत्ता और राष्ट्रीय उद्देश्य से जुड़ जाए, तो भारत न केवल महाशक्ति बन सकता है, बल्कि एक नई विश्वव्यवस्था की दिशा भी तय कर सकता है।


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