अमेरिका के साथ समझौतों में भारत की कृषि, ऊर्जा, स्वायत्तता और नैतिकता की परीक्षा

 जब राष्ट्रहित से ऊपर दबाव हो



इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब राष्ट्र केवल समझौते नहीं करते, बल्कि अपनी दिशा तय करते हैं। भारत और अमेरिका के बीच हालिया समझौते ऐसे ही क्षण का प्रतिनिधित्व करते हैं। सरकार इन्हें 21वीं सदी के भारत की कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत कर रही है। कहा जा रहा है कि इससे भारत वैश्विक शक्ति संतुलन में निर्णायक भूमिका निभाएगा।

लेकिन सवाल यह नहीं है कि भारत अमेरिका के करीब क्यों जा रहा है। सवाल यह है कि किस शर्त पर, किस कीमत पर और किस दिशा में?

अगर इन समझौतों को भावनात्मक राष्ट्रवाद, कूटनीतिक शब्दावली और सरकारी प्रचार से अलग रखकर देखा जाए, तो जो तस्वीर उभरती है वह चिंताजनक है। कृषि क्षेत्र में अमेरिका को विशेष छूट, अमेरिकी उत्पादों पर शून्य टैरिफ, भारतीय उत्पादों पर 18 प्रतिशत तक शुल्क, ऊर्जा नीति में रूस और ईरान जैसे परंपरागत सहयोगियों की उपेक्षा और अमेरिका-निर्देशित वेनेजुएला से व्यापार की पहल—ये सब मिलकर यह संकेत देते हैं कि यह साझेदारी नहीं, दबाव में लिया गया निर्णय है।

यह लेख उसी दबाव, उसी झुकाव और उसी दिशा की आलोचनात्मक पड़ताल करता है।

कृषि: अन्नदाता के सम्मान का सबसे बड़ा विरोधाभास

भारत की राजनीति में किसान केवल एक आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक प्रतीक रहा है। “अन्नदाता” शब्द का प्रयोग केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि यह बताने के लिए किया जाता है कि किसान राष्ट्र की बुनियाद है। लेकिन जब नीति बनती है, तो यही किसान सबसे पहले उपेक्षित होता है।

अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में छूट देना इसी उपेक्षा का उदाहरण है। अमेरिकी कृषि व्यवस्था विशाल कॉर्पोरेट फार्म्स, भारी सरकारी सब्सिडी, उन्नत तकनीक और वैश्विक लॉबी पर आधारित है। इसके विपरीत भारतीय कृषि छोटे और सीमांत किसानों पर टिकी है, जिनके पास न पूंजी है, न तकनीकी सुरक्षा, न बाज़ार की स्थिरता।

यह कहना कि दोनों को एक ही बाजार में प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए, सैद्धांतिक रूप से भी अन्यायपूर्ण है। यह मुक्त व्यापार नहीं, बल्कि असमान शक्ति-संतुलन को नीति का रूप देना है।

विडंबना यह है कि अमेरिका WTO में अपने किसानों की सब्सिडी कम करने से लगातार इंकार करता रहा है, लेकिन भारत से अपेक्षा करता है कि वह अपने किसानों को वैश्विक बाजार के हवाले कर दे। यह दोहरा मापदंड नहीं, बल्कि व्यवस्थित दबाव है।

सवाल यह है कि क्या भारत अपने किसानों को वैश्विक एग्रीबिज़नेस के सामने बिना किसी सुरक्षा कवच के खड़ा करने को तैयार है? अगर हाँ, तो फिर किसान सम्मान की राजनीति को केवल चुनावी नारा ही माना जाएगा।

शून्य टैरिफ बनाम 18 प्रतिशत शुल्क: बराबरी का भ्रम

सरकार बार-बार यह दोहराती है कि भारत और अमेरिका बराबरी के रणनीतिक साझेदार हैं। लेकिन जब व्यापारिक शर्तों को देखा जाता है, तो यह बराबरी कहीं दिखाई नहीं देती।

अमेरिका को भारतीय बाजार में शून्य टैरिफ की सुविधा मिलती है, जबकि भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी बाजार में 18 प्रतिशत तक शुल्क लगाया जाता है। यह व्यापार संतुलन नहीं, बल्कि व्यापारिक वर्चस्व है।

इतिहास बताता है कि ऐसे समझौते विकास नहीं, निर्भरता पैदा करते हैं। औपनिवेशिक दौर में भी भारत को खुले बाजार की भूमिका दी गई थी, जबकि मुनाफा साम्राज्यवादी शक्तियों ने कमाया। आज फर्क सिर्फ़ भाषा का है—तब इसे साम्राज्यवाद कहा जाता था, आज इसे रणनीतिक साझेदारी कहा जा रहा है।

अगर भारत सचमुच एक उभरती वैश्विक शक्ति है, तो उसे बराबरी की शर्तों पर बात करनी चाहिए थी। ऐसा न होना इस बात का संकेत है कि या तो सौदेबाज़ी में भारत कमजोर पड़ा, या फिर उसने जानबूझकर झुकना स्वीकार किया।

ऊर्जा नीति: आत्मनिर्भरता से निर्देशित निर्भरता की ओर

ऊर्जा किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता की रीढ़ होती है। भारत ने दशकों में एक संतुलित ऊर्जा नीति विकसित की थी, जिसमें रूस, ईरान और खाड़ी देशों की केंद्रीय भूमिका थी। यह नीति सस्ती, स्थिर और रणनीतिक रूप से स्वतंत्र थी।

लेकिन हालिया फैसलों में यह संतुलन टूटता दिखाई देता है। रूस से दूरी, ईरान से चुप्पी और अमेरिका तथा अमेरिका-निर्देशित वेनेजुएला से ऊर्जा व्यापार की चर्चा—यह बदलाव बाज़ार की अनिवार्यता से कम और भू-राजनीतिक दबाव से अधिक प्रेरित लगता है।

ऊर्जा नीति का इस तरह राजनीतिकरण खतरनाक है। इससे न केवल कीमतें प्रभावित होती हैं, बल्कि देश की रणनीतिक स्वतंत्रता भी दांव पर लगती है। ऊर्जा के मामले में निर्भरता का अर्थ है—नीति में सीमित विकल्प और दबाव के सामने झुकने की मजबूरी।

रूस की उपेक्षा: रणनीतिक स्मृति-लोप

रूस भारत का कोई साधारण साझेदार नहीं रहा है। शीतयुद्ध से लेकर आज तक रूस ने भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समर्थन दिया, रक्षा क्षेत्र में भरोसेमंद सहयोग किया और संकट के समय सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराई।

आज उसी रूस को दरकिनार करना केवल कूटनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि रणनीतिक कृतघ्नता जैसा प्रतीत होता है। यह संदेश जाता है कि भारत दबाव में अपने पुराने सहयोगियों को छोड़ सकता है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भरोसा पूंजी की तरह होता है। एक बार खो जाए, तो भविष्य में कोई भी देश भारत पर पूरी तरह भरोसा करने से पहले सौ बार सोचेगा।

ईरान: भौगोलिक यथार्थ की अनदेखी

ईरान भारत के लिए केवल एक ऊर्जा स्रोत नहीं, बल्कि भौगोलिक और रणनीतिक दृष्टि से अहम साझेदार रहा है। चाबहार बंदरगाह इसका उदाहरण है। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में भारत का ईरान से पीछे हटना यह दिखाता है कि भूगोल से अधिक अब राजनीतिक निर्देश महत्वपूर्ण हो गए हैं।

यह नीति दीर्घकालिक नहीं हो सकती। भूगोल बदला नहीं जा सकता, लेकिन साझेदार बदले जा सकते हैं—और भारत इस सच्चाई को नज़रअंदाज़ करता दिख रहा है।

वेनेजुएला: चयनित नैतिकता का अंतरराष्ट्रीय खेल

वेनेजुएला वर्षों तक अमेरिका की नजर में ‘अलोकतांत्रिक’ और ‘अस्वीकार्य’ रहा। उस पर प्रतिबंध लगे, उसकी सरकार को गिराने की कोशिशें हुईं। लेकिन जब अमेरिकी ऊर्जा जरूरतें बदलीं, तो वही वेनेजुएला स्वीकार्य हो गया।

भारत का इस प्रक्रिया में शामिल होना यह दर्शाता है कि उसकी विदेश नीति अब स्वतंत्र नैतिक विवेक से नहीं, बल्कि अमेरिकी संकेतों से संचालित हो रही है।

यह चयनित नैतिकता है—जहाँ सही और गलत का निर्धारण सिद्धांत से नहीं, सुविधा से होता है।

अमेरिकी दादागिरी: शक्ति ही नियम

आज की वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका साझेदार कम और नियामक अधिक दिखाई देता है। व्यापार, ऊर्जा, तकनीक या सुरक्षा—नियम वही माने जाते हैं जो वाशिंगटन तय करे।

अमेरिकी दादागिरी का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि वह देशों को विकल्पहीन बना देती है—या साथ चलो, या कीमत चुकाओ। प्रतिबंध, टैरिफ, तकनीकी रोक और राजनीतिक दबाव—ये सभी उसी दादागिरी के औज़ार हैं।

भारत जैसे देश, जो कभी इस व्यवस्था को चुनौती देने की क्षमता रखते थे, अब उसी के भीतर अपनी जगह सुरक्षित करने की कोशिश करते दिख रहे हैं।

वैश्विक एकध्रुवीयता का खुला समर्थन

भारत की ऐतिहासिक विदेश नीति बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की पक्षधर रही है। लेकिन हालिया फैसले संकेत देते हैं कि भारत अब वैश्विक एकध्रुवीयता को चुनौती देने के बजाय उसका मौन समर्थन कर रहा है।

एकध्रुवीय दुनिया में नियम ताकतवर बनाते हैं, न्याय नहीं। जब भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश इस व्यवस्था को वैधता देते हैं, तो वे न केवल अपनी स्वतंत्र भूमिका खोते हैं, बल्कि वैश्विक संतुलन की संभावनाओं को भी कमजोर करते हैं।

लोकतंत्र की अनुपस्थिति: संसद, किसान और जनता

इतने बड़े और दूरगामी फैसले संसद में व्यापक बहस के बिना, किसानों और राज्यों से संवाद के बिना लिए गए। यह केवल नीति की समस्या नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का क्षरण है।

विदेश नीति किसी बंद कमरे का सौदा नहीं हो सकती। यह राष्ट्रीय सहमति का विषय होना चाहिए।

मोदी सरकार और नैतिक जिम्मेदारी

मोदी सरकार स्वयं को निर्णायक, साहसी और राष्ट्रहितैषी बताती रही है। लेकिन निर्णायक होना और दबाव में झुक जाना—दो अलग बातें हैं। नैतिक नेतृत्व का अर्थ केवल बड़े भाषण नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में स्वतंत्र निर्णय लेने का साहस होता है।

जब फैसले दबाव में हों, जब शर्तें असमान हों और जब पुराने सहयोगियों की उपेक्षा हो—तो यह नेतृत्व नहीं, अनुकूलन कहलाता है।

निष्कर्ष: यह समझौता नहीं, चेतावनी है

यह पूरा घटनाक्रम किसी एक समझौते का मामला नहीं है। यह उस दिशा का संकेत है, जिस ओर भारत की विदेश और आर्थिक नीति बढ़ रही है।

अगर फैसले दबाव में हों, अगर शर्तें असमान हों और अगर राष्ट्रहित से पहले वैश्विक शक्ति-संतुलन को तरजीह मिले—तो इसे उपलब्धि नहीं कहा जा सकता।

यह केवल रणनीतिक चूक नहीं।

यह भारत की नैतिक, कूटनीतिक और ऐतिहासिक भूमिका से विचलन है।

और इतिहास ऐसे विचलनों को बहुत देर तक माफ नहीं करता।

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