वेनेजुएला के बाद ईरान : क्या ट्रंप की अगली चाल मध्य-पूर्व को फिर सुलगाएगी?

 

विश्व राजनीति में कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जो केवल किसी एक देश या नेता से जुड़े नहीं होते, बल्कि पूरे अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन की दिशा तय करते हैं। “वेनेजुएला के बाद ईरान—क्या डोनाल्ड ट्रंप का अगला निशाना यही होगा?” ऐसा ही एक प्रश्न है। यह सवाल केवल अमेरिका और ईरान के बीच संभावित टकराव का नहीं, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था का है जो शीतयुद्ध के बाद बनी थी और अब धीरे-धीरे दरकती दिखाई दे रही है।

डोनाल्ड ट्रंप कोई पारंपरिक अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं रहे हैं। उनकी राजनीति न तो कूटनीतिक शिष्टाचार से बंधी रही, न ही वैचारिक आदर्शवाद से। वे शक्ति को भाषा की तरह और भाषा को हथियार की तरह प्रयोग करते हैं। यही कारण है कि उनके पहले कार्यकाल में अमेरिका की विदेश नीति ने बार-बार दुनिया को चौंकाया—चाहे वह ईरान परमाणु समझौते से बाहर निकलना हो, वेनेजुएला पर आर्थिक शिकंजा कसना हो या उत्तर कोरिया के तानाशाह से ‘दोस्ती’ का दावा।

आज, जब वेनेजुएला अमेरिकी दबाव में लगभग निष्क्रिय अवस्था में पहुँच चुका है, तब स्वाभाविक है कि निगाहें ईरान पर टिकें। लेकिन सवाल यह नहीं है कि ईरान अगला निशाना है या नहीं—सवाल यह है कि ट्रंप ईरान के ज़रिये दुनिया को क्या संदेश देना चाहते हैं।

वेनेजुएला : एक चेतावनी, एक प्रयोग

वेनेजुएला के साथ अमेरिका की नीति को यदि ध्यान से देखा जाए, तो वह एक तरह की प्रयोगशाला थी। निकोलस मादुरो की सरकार को गिराने के लिए अमेरिका ने कोई प्रत्यक्ष सैन्य हमला नहीं किया। इसके बजाय उसने आर्थिक प्रतिबंधों, राजनयिक अलगाव और मनोवैज्ञानिक दबाव की नीति अपनाई। तेल निर्यात पर रोक, डॉलर आधारित वित्तीय प्रणाली से बहिष्कार और विपक्ष को वैधता—ये सभी कदम इस रणनीति के हिस्से थे।

परिणाम यह हुआ कि सत्ता परिवर्तन तो नहीं हुआ, लेकिन वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। आम जनता संकट में फँसी, जबकि सत्ता संरचना किसी तरह टिकी रही। अमेरिका ने यह संदेश अवश्य दे दिया कि अब युद्ध के बिना भी किसी देश को घुटनों पर लाया जा सकता है।

यही मॉडल ईरान के संदर्भ में डर पैदा करता है।

ईरान : केवल एक देश नहीं, एक धुरी

ईरान को वेनेजुएला की तरह देखना एक बुनियादी भूल होगी। ईरान न केवल मध्य-पूर्व की भू-राजनीति का केंद्रीय स्तंभ है, बल्कि वह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, इस्लामी राजनीति और अमेरिका-विरोधी धुरी का भी प्रमुख आधार है।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर दुनिया का लगभग पाँचवाँ हिस्सा तेल गुजरता है। ईरान की किसी भी अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसके अतिरिक्त, लेबनान में हिज़्बुल्लाह, यमन में हूती, इराक और सीरिया में शिया मिलिशियाएँ—ये सब ईरान के प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा हैं।

इसलिए ईरान पर हमला केवल एक राष्ट्र पर हमला नहीं होगा, बल्कि पूरे मध्य-पूर्वी संतुलन को झकझोरने वाला कदम होगा।

परमाणु समझौते से अलगाव : टकराव की औपचारिक शुरुआत

2015 में हुआ ईरान परमाणु समझौता (JCPOA) अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की एक बड़ी उपलब्धि माना गया था। इसका उद्देश्य था ईरान को परमाणु हथियार से दूर रखना और बदले में उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ना। लेकिन ट्रंप ने इसे “इतिहास का सबसे खराब समझौता” कहकर 2018 में एकतरफा समाप्त कर दिया।

यह कदम केवल ईरान के खिलाफ नहीं था, बल्कि यूरोप, रूस और चीन के प्रति भी एक संदेश था—

कि अमेरिका अब सामूहिक निर्णयों की बाध्यता स्वीकार नहीं करेगा।

यहीं से ईरान और अमेरिका के बीच अविश्वास खुली शत्रुता में बदल गया।

‘मैक्सिमम प्रेशर’ : युद्ध के बिना युद्ध

ट्रंप प्रशासन ने ईरान के खिलाफ जिस नीति को अपनाया, उसे आधिकारिक रूप से “Maximum Pressure Strategy” कहा गया। इसके अंतर्गत—

ईरान के तेल निर्यात पर लगभग पूर्ण प्रतिबंध

अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली से अलगाव

विदेशी कंपनियों को ईरान से व्यापार न करने की चेतावनी

सैन्य दबाव और सीमित कार्रवाई

जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या इस नीति का चरम बिंदु थी। यह एक ऐसा कदम था जिसने स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका प्रतीकात्मक नहीं, वास्तविक शक्ति प्रयोग से भी पीछे नहीं हटेगा—भले ही वह पूर्ण युद्ध न हो।

इज़राइल : मौन लेकिन निर्णायक भूमिका

ट्रंप की ईरान नीति को समझने के लिए इज़राइल को अलग करके नहीं देखा जा सकता। यरुशलम को इज़राइल की राजधानी मान्यता देना, गोलान हाइट्स पर उसका दावा स्वीकार करना और अरब देशों के साथ उसके संबंध सामान्य करवाना—ये सभी कदम एक व्यापक रणनीति का हिस्सा थे।

ईरान, इज़राइल की दृष्टि में अस्तित्वगत खतरा है। ट्रंप ने इस चिंता को अमेरिकी नीति का केंद्रीय तत्व बना दिया। इसीलिए ईरान पर दबाव केवल अमेरिकी हितों का नहीं, बल्कि इज़राइली सुरक्षा दृष्टिकोण का भी विस्तार है।

क्या ट्रंप युद्ध चाहते हैं?

यह प्रश्न बार-बार उठता है और उत्तर लगभग हर बार यही निकलता है—नहीं।

ट्रंप युद्ध के बजाय सौदे में विश्वास रखते हैं। वे ऐसे नेता हैं जो संघर्ष को बाज़ार की तरह देखते हैं—जहाँ अंततः किसी को झुकना होता है।

लेकिन समस्या यह है कि ईरान झुकने वाला देश नहीं है। उसकी राजनीतिक-सांस्कृतिक संरचना संघर्ष में पली-बढ़ी है। 1979 की क्रांति के बाद से ही अमेरिका-विरोध ईरानी सत्ता की वैचारिक रीढ़ रहा है।

इसलिए यहाँ टकराव लंबा और थकाऊ हो सकता है, भले ही वह पूर्ण युद्ध में न बदले।

असली निशाना : ईरान या चीन-रूस?

यहाँ एक बुनियादी प्रश्न उठता है—क्या ईरान वास्तव में लक्ष्य है, या वह किसी बड़े खेल का मोहरा मात्र है?

ईरान, चीन की ऊर्जा सुरक्षा का अहम हिस्सा है और रूस के साथ उसकी सामरिक साझेदारी बढ़ती जा रही है। ऐसे में ईरान को कमजोर करना वास्तव में चीन-रूस धुरी पर दबाव बनाना है।

इस दृष्टि से देखा जाए तो ट्रंप की नीति किसी एक देश के विरुद्ध नहीं, बल्कि उभरती बहुध्रुवीय दुनिया के विरुद्ध है।

भारत की दुविधा

भारत के लिए यह पूरा परिदृश्य असहज है। एक ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, दूसरी ओर ईरान के साथ ऐतिहासिक और ऊर्जा संबंध। चाबहार बंदरगाह भारत की मध्य एशिया नीति का महत्वपूर्ण आधार है, जो ईरान के बिना अधूरा है।

भारत की विदेश नीति की परीक्षा ऐसे ही क्षणों में होती है—जहाँ उसे स्पष्ट पक्ष लेने के बजाय संतुलन साधना पड़ता है।

निष्कर्ष : टकराव की राजनीति और अनिश्चित भविष्य

वेनेजुएला के बाद ईरान को अगला निशाना मानना पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन अधूरा है। ईरान केवल लक्ष्य नहीं, बल्कि एक संदेश है—उन सभी देशों के लिए जो अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने का साहस रखते हैं।

ट्रंप की राजनीति में युद्ध अंतिम विकल्प है, पर दबाव निरंतर हथियार। ईरान इस दबाव को कितना सह पाएगा, यह कहना कठिन है। लेकिन इतना तय है कि ईरान पर केंद्रित यह संघर्ष आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेगा।

और शायद यही इस पूरे प्रश्न का सबसे चिंताजनक उत्तर है।

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