India’s Silence and the American Strategic Playbook


भारत का मौन और अमेरिकी रणनीति

India’s Silence and the American Strategic Playbook

प्रस्तावना: चुप्पी भी एक नीति होती है

Introduction: Silence Is Also a Policy

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हर हमला मिसाइल से नहीं होता। कई बार हमला बयान से होता है, कई बार प्रतिबंध से, और कई बार—चुप्पी से। जब कोई देश अन्याय के सामने चुप रहता है, तो वह केवल उस अन्याय को स्वीकार नहीं करता, बल्कि भविष्य में अपने साथ होने वाले अन्याय का रास्ता भी साफ़ करता है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के साथ जो हुआ, उसे केवल एक “तानाशाह बनाम लोकतंत्र” की कहानी मान लेना ऐतिहासिक भूल होगी। वह दरअसल एक रणनीतिक मॉडल था—एक ऐसा मॉडल जिसे अमेरिका उन देशों पर आज़माता है जो उसकी तय की गई वैश्विक सीमाओं से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं।

भारत आज उसी संक्रमण बिंदु पर खड़ा दिखाई देता है। फर्क इतना है कि भारत वेनेजुएला नहीं है—लेकिन क्या रणनीति बदली है? यह सवाल आज भारत के मौन, उसकी तथाकथित तटस्थता और अमेरिका के बदलते सुरों को देखकर और भी गंभीर हो जाता है।

चीन–पाकिस्तान–बांग्लादेश: घेराव नहीं, अवसर

China–Pakistan–Bangladesh: Not an Encirclement, But an Opportunity for the US

भारत के चारों ओर बढ़ता दबाव कोई नई घटना नहीं है। चीन के साथ सीमा तनाव, पाकिस्तान के साथ स्थायी शत्रुता और बांग्लादेश में भारत-विरोधी राजनीतिक धाराओं का उभार—इन तीनों को अक्सर अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखा जाता है। लेकिन वैश्विक शक्ति-संतुलन की दृष्टि से ये तीनों मिलकर एक ऐसा परिवेश बनाते हैं, जो अमेरिका के लिए अत्यंत उपयोगी है।

अमेरिका को भारत को घेरने की ज़रूरत नहीं है; उसे बस यह सुनिश्चित करना है कि भारत स्वतंत्र न हो पाए। जब भारत अपनी ऊर्जा चीन सीमा पर लगाता है, जब वह पाकिस्तान-प्रायोजित अस्थिरता से जूझता है, और जब पूर्वी सीमा पर राजनीतिक अनिश्चितता बनी रहती है—तब भारत वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं रहता। यही अमेरिका का लाभ है।

यह वही रणनीति है जिसे शीतयुद्ध के बाद अमेरिका ने कई उभरती शक्तियों के साथ अपनाया—उन्हें इतना उलझा दो कि वे दिशा तय ही न कर सकें।

वेनेजुएला मॉडल: सत्ता परिवर्तन नहीं, छवि विध्वंस

The Venezuela Model: Not Regime Change, But Image Destruction

वेनेजुएला में मादुरो के खिलाफ कार्रवाई अचानक नहीं हुई। पहले अंतरराष्ट्रीय मीडिया में नैरेटिव तैयार किया गया—तानाशाह, चुनावी धांधली, मानवाधिकार उल्लंघन। फिर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए। फिर समानांतर नेतृत्व को मान्यता दी गई। अंततः प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दबाव से सत्ता को अवैध घोषित करने की कोशिश की गई।

यह पूरा मॉडल इस बात पर आधारित था कि पहले देश की छवि तोड़ो, फिर उसकी संप्रभुता। आज भारत के संदर्भ में यह मॉडल हूबहू लागू नहीं होगा, लेकिन इसके तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। लोकतंत्र सूचकांक, प्रेस फ्रीडम रैंकिंग, अल्पसंख्यक अधिकारों पर रिपोर्ट—ये सब आधुनिक दौर के हथियार हैं।

यह युद्ध बंदूक से नहीं, डाटा और डिस्कोर्स से लड़ा जाता है।

मोदी मादुरो नहीं हैं, लेकिन भारत भी अछूता नहीं

Modi Is Not Maduro, But India Is Not Immune

यह सच है कि नरेंद्र मोदी मादुरो नहीं हैं। भारत की संस्थाएँ, उसकी अर्थव्यवस्था और उसका वैश्विक एकीकरण कहीं अधिक गहरा है। लेकिन यह मान लेना कि इसलिए भारत पर कोई दबाव नहीं डाला जा सकता, आत्मसंतोष है। आधुनिक साम्राज्यवाद सत्ता परिवर्तन से पहले सहमति निर्माण करता है—दुनिया को यह समझाने की कोशिश करता है कि “यह देश रास्ते से भटक रहा है।”

भारत के मामले में यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। “लोकतंत्र संकट में है”, “संविधान खतरे में है”, “अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं”—ये वाक्य अब केवल आंतरिक बहस का हिस्सा नहीं रहे, बल्कि अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनते जा रहे हैं। यही वह बिंदु है जहाँ वेनेजुएला मॉडल का भारतीय संस्करण आकार ले सकता है।

ट्रंप के बयान: शोर नहीं, संकेत

Trump’s Statements: Noise or Signal?

डोनाल्ड ट्रंप को अक्सर एक असंतुलित, सनकी नेता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन राजनीति में बार-बार बोली गई बातों को केवल सनक कहकर टाल देना खतरनाक होता है। ट्रंप के भारत और मोदी पर लगातार बयान—चाहे वह व्यापार को लेकर हों, टैरिफ को लेकर हों या चुनावी राजनीति को लेकर—असल में अमेरिकी सत्ता-तंत्र के भीतर मौजूद उस असंतोष को उजागर करते हैं, जो भारत की बढ़ती स्वायत्तता से जुड़ा है।

ट्रंप वह कहते हैं जो अन्य अमेरिकी नेता कूटनीतिक भाषा में कहते हैं। फर्क सिर्फ़ इतना है कि ट्रंप परतें नहीं चढ़ाते। जब वे भारत को “टैरिफ किंग” कहते हैं या मोदी की लोकप्रियता पर कटाक्ष करते हैं, तो यह केवल बयान नहीं होता—यह सीमा रेखा खींचने का प्रयास होता है।

वेनेजुएला पर भारत की चुप्पी: तटस्थता या आत्मसेंसरशिप

India’s Silence on Venezuela: Neutrality or Self-Censorship?

एक लोकतांत्रिक देश के निर्वाचित राष्ट्रपति को विदेशी ताकतें अगवा कर, अमेरिकी अदालत में पेश करती हैं। यह घटना अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और लोकतंत्र—तीनों के लिए गंभीर प्रश्न खड़े करती है। लेकिन भारत, जो स्वयं को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है, इस पर मौन रहता है।

यह मौन क्या है? क्या यह संतुलन है, या डर? क्या यह रणनीति है, या आत्मसेंसरशिप? जब भारत ऐसे मामलों पर नहीं बोलता, तो वह यह संकेत देता है कि वह वैश्विक अन्याय पर स्टैंड लेने को तैयार नहीं है—खासकर तब, जब अन्याय करने वाला शक्तिशाली हो।

यही मौन भविष्य में भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है।

Global South और भारत की घटती नैतिक साख

Global South and India’s Shrinking Moral Authority

भारत पिछले कुछ वर्षों से Global South का स्वघोषित नेता बनने की कोशिश कर रहा है। G20, BRICS और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह दावा बार-बार दोहराया गया है। लेकिन नेतृत्व केवल मंच से भाषण देने से नहीं आता। नेतृत्व आता है तब, जब कोई देश संकट के समय बोलता है।

लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और पश्चिम एशिया यह देख रहे हैं कि भारत किसके साथ खड़ा होता है और किसके सामने चुप रहता है। वेनेजुएला पर भारत की चुप्पी ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अभी भी जोखिम उठाने को तैयार नहीं है। इससे उसकी नैतिक साख को नुकसान पहुँचा है—और बिना नैतिक साख के कोई भी देश वैश्विक नेता नहीं बन सकता।

अमेरिकी मित्रता: सहयोग या अनुशासन

American Friendship: Partnership or Discipline?

अमेरिका भारत को रणनीतिक साझेदार कहता है, लेकिन इस साझेदारी की शर्तें स्पष्ट हैं। रक्षा सौदे, तकनीकी सहयोग, QUAD जैसे मंच—ये सभी अवसर भी हैं और सीमाएँ भी। अमेरिका चाहता है कि भारत उसके साथ रहे, लेकिन उसकी शर्तों पर।

इस मित्रता के बदले अपेक्षा यह है कि भारत कुछ मुद्दों पर बोले नहीं, कुछ देशों पर सवाल न उठाए और कुछ कार्रवाइयों को “आंतरिक मामला” कहकर टाल दे। यही वह बिंदु है जहाँ मित्रता अनुशासन में बदल जाती है। इतिहास गवाह है कि अमेरिका मित्रों को भी तभी तक स्वीकार करता है, जब तक वे आज्ञाकारी हों।

तटस्थता का भ्रम: संतुलन बनाम दिशाहीनता

The Illusion of Neutrality: Balance vs Directionlessness

भारत आज हर मोर्चे पर तटस्थ रहने की कोशिश कर रहा है। रूस–यूक्रेन युद्ध हो या पश्चिम एशिया का संकट, भारत संतुलन साधने की भाषा बोलता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संतुलन और दिशाहीनता के बीच की रेखा बहुत पतली होती है।

जब तटस्थता सिद्धांत से नहीं, डर से आती है, तो वह सम्मान नहीं दिलाती। आज भारत की तटस्थता को कई देश संतुलन नहीं, बल्कि अनिश्चितता के रूप में देख रहे हैं। और अनिश्चित देश पर भरोसा नहीं किया जाता—उसे केवल इस्तेमाल किया जाता है।

भारत के सामने विकल्प: सुविधा या नेतृत्व

India’s Choice: Convenience or Leadership

भारत के सामने आज स्पष्ट विकल्प है। वह या तो अमेरिका का सुविधाजनक साझेदार बना रहे—जो दबाव में चुप रहता है और लाभ में सहयोग करता है—या फिर वह Global South का वास्तविक नेता बने, जो सही और गलत पर स्पष्ट बोलता है, चाहे उसकी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।

वेनेजुएला पर बोलना केवल एक देश के समर्थन का सवाल नहीं है; यह उस सिद्धांत का सवाल है कि क्या भारत लोकतांत्रिक संप्रभुता के उल्लंघन का विरोध करेगा या नहीं। आज यदि भारत नहीं बोलेगा, तो कल जब उस पर सवाल उठेंगे, तब उसके पास नैतिक आधार नहीं बचेगा।

निष्कर्ष: चुप्पी सबसे खतरनाक नीति है

Conclusion: Silence Is the Most Dangerous Policy

वेनेजुएला भारत नहीं है।

मोदी मादुरो नहीं हैं।

लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि साम्राज्य पहले कमजोर को नहीं, स्वतंत्र को नियंत्रित करना चाहते हैं। भारत की चुप्पी, उसकी सावधानी और उसकी तटस्थता—इन सबको दुनिया पढ़ रही है। सवाल यह है कि भारत खुद को कैसे पढ़ता है।

अगर भारत Global South का नेता बनना चाहता है, तो उसे बोलना सीखना होगा—खासकर तब, जब बोलना असहज हो। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सबसे पहले वही देश निशाने पर आते हैं, जो यह मान लेते हैं कि चुप रहकर वे बच जाएंगे।

चुप्पी कभी सुरक्षा नहीं देती।

वह केवल यह बताती है कि अगला नंबर किसका हो सकता है।

प्रस्तावना: चुप्पी भी एक नीति होती है

Introduction: Silence Is Also a Policy

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हर हमला मिसाइल से नहीं होता। कई बार हमला बयान से होता है, कई बार प्रतिबंध से, और कई बार—चुप्पी से। जब कोई देश अन्याय के सामने चुप रहता है, तो वह केवल उस अन्याय को स्वीकार नहीं करता, बल्कि भविष्य में अपने साथ होने वाले अन्याय का रास्ता भी साफ़ करता है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के साथ जो हुआ, उसे केवल एक “तानाशाह बनाम लोकतंत्र” की कहानी मान लेना ऐतिहासिक भूल होगी। वह दरअसल एक रणनीतिक मॉडल था—एक ऐसा मॉडल जिसे अमेरिका उन देशों पर आज़माता है जो उसकी तय की गई वैश्विक सीमाओं से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं।

भारत आज उसी संक्रमण बिंदु पर खड़ा दिखाई देता है। फर्क इतना है कि भारत वेनेजुएला नहीं है—लेकिन क्या रणनीति बदली है? यह सवाल आज भारत के मौन, उसकी तथाकथित तटस्थता और अमेरिका के बदलते सुरों को देखकर और भी गंभीर हो जाता है।

चीन–पाकिस्तान–बांग्लादेश: घेराव नहीं, अवसर

China–Pakistan–Bangladesh: Not an Encirclement, But an Opportunity for the US

भारत के चारों ओर बढ़ता दबाव कोई नई घटना नहीं है। चीन के साथ सीमा तनाव, पाकिस्तान के साथ स्थायी शत्रुता और बांग्लादेश में भारत-विरोधी राजनीतिक धाराओं का उभार—इन तीनों को अक्सर अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखा जाता है। लेकिन वैश्विक शक्ति-संतुलन की दृष्टि से ये तीनों मिलकर एक ऐसा परिवेश बनाते हैं, जो अमेरिका के लिए अत्यंत उपयोगी है।

अमेरिका को भारत को घेरने की ज़रूरत नहीं है; उसे बस यह सुनिश्चित करना है कि भारत स्वतंत्र न हो पाए। जब भारत अपनी ऊर्जा चीन सीमा पर लगाता है, जब वह पाकिस्तान-प्रायोजित अस्थिरता से जूझता है, और जब पूर्वी सीमा पर राजनीतिक अनिश्चितता बनी रहती है—तब भारत वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं रहता। यही अमेरिका का लाभ है।

यह वही रणनीति है जिसे शीतयुद्ध के बाद अमेरिका ने कई उभरती शक्तियों के साथ अपनाया—उन्हें इतना उलझा दो कि वे दिशा तय ही न कर सकें।

वेनेजुएला मॉडल: सत्ता परिवर्तन नहीं, छवि विध्वंस

The Venezuela Model: Not Regime Change, But Image Destruction

वेनेजुएला में मादुरो के खिलाफ कार्रवाई अचानक नहीं हुई। पहले अंतरराष्ट्रीय मीडिया में नैरेटिव तैयार किया गया—तानाशाह, चुनावी धांधली, मानवाधिकार उल्लंघन। फिर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए। फिर समानांतर नेतृत्व को मान्यता दी गई। अंततः प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दबाव से सत्ता को अवैध घोषित करने की कोशिश की गई।

यह पूरा मॉडल इस बात पर आधारित था कि पहले देश की छवि तोड़ो, फिर उसकी संप्रभुता। आज भारत के संदर्भ में यह मॉडल हूबहू लागू नहीं होगा, लेकिन इसके तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। लोकतंत्र सूचकांक, प्रेस फ्रीडम रैंकिंग, अल्पसंख्यक अधिकारों पर रिपोर्ट—ये सब आधुनिक दौर के हथियार हैं।

यह युद्ध बंदूक से नहीं, डाटा और डिस्कोर्स से लड़ा जाता है।

मोदी मादुरो नहीं हैं, लेकिन भारत भी अछूता नहीं

Modi Is Not Maduro, But India Is Not Immune

यह सच है कि नरेंद्र मोदी मादुरो नहीं हैं। भारत की संस्थाएँ, उसकी अर्थव्यवस्था और उसका वैश्विक एकीकरण कहीं अधिक गहरा है। लेकिन यह मान लेना कि इसलिए भारत पर कोई दबाव नहीं डाला जा सकता, आत्मसंतोष है। आधुनिक साम्राज्यवाद सत्ता परिवर्तन से पहले सहमति निर्माण करता है—दुनिया को यह समझाने की कोशिश करता है कि “यह देश रास्ते से भटक रहा है।”

भारत के मामले में यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। “लोकतंत्र संकट में है”, “संविधान खतरे में है”, “अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं”—ये वाक्य अब केवल आंतरिक बहस का हिस्सा नहीं रहे, बल्कि अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनते जा रहे हैं। यही वह बिंदु है जहाँ वेनेजुएला मॉडल का भारतीय संस्करण आकार ले सकता है।

ट्रंप के बयान: शोर नहीं, संकेत

Trump’s Statements: Noise or Signal?

डोनाल्ड ट्रंप को अक्सर एक असंतुलित, सनकी नेता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन राजनीति में बार-बार बोली गई बातों को केवल सनक कहकर टाल देना खतरनाक होता है। ट्रंप के भारत और मोदी पर लगातार बयान—चाहे वह व्यापार को लेकर हों, टैरिफ को लेकर हों या चुनावी राजनीति को लेकर—असल में अमेरिकी सत्ता-तंत्र के भीतर मौजूद उस असंतोष को उजागर करते हैं, जो भारत की बढ़ती स्वायत्तता से जुड़ा है।

ट्रंप वह कहते हैं जो अन्य अमेरिकी नेता कूटनीतिक भाषा में कहते हैं। फर्क सिर्फ़ इतना है कि ट्रंप परतें नहीं चढ़ाते। जब वे भारत को “टैरिफ किंग” कहते हैं या मोदी की लोकप्रियता पर कटाक्ष करते हैं, तो यह केवल बयान नहीं होता—यह सीमा रेखा खींचने का प्रयास होता है।

वेनेजुएला पर भारत की चुप्पी: तटस्थता या आत्मसेंसरशिप

India’s Silence on Venezuela: Neutrality or Self-Censorship?

एक लोकतांत्रिक देश के निर्वाचित राष्ट्रपति को विदेशी ताकतें अगवा कर, अमेरिकी अदालत में पेश करती हैं। यह घटना अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और लोकतंत्र—तीनों के लिए गंभीर प्रश्न खड़े करती है। लेकिन भारत, जो स्वयं को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है, इस पर मौन रहता है।

यह मौन क्या है? क्या यह संतुलन है, या डर? क्या यह रणनीति है, या आत्मसेंसरशिप? जब भारत ऐसे मामलों पर नहीं बोलता, तो वह यह संकेत देता है कि वह वैश्विक अन्याय पर स्टैंड लेने को तैयार नहीं है—खासकर तब, जब अन्याय करने वाला शक्तिशाली हो।

यही मौन भविष्य में भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है।

Global South और भारत की घटती नैतिक साख

Global South and India’s Shrinking Moral Authority

भारत पिछले कुछ वर्षों से Global South का स्वघोषित नेता बनने की कोशिश कर रहा है। G20, BRICS और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह दावा बार-बार दोहराया गया है। लेकिन नेतृत्व केवल मंच से भाषण देने से नहीं आता। नेतृत्व आता है तब, जब कोई देश संकट के समय बोलता है।

लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और पश्चिम एशिया यह देख रहे हैं कि भारत किसके साथ खड़ा होता है और किसके सामने चुप रहता है। वेनेजुएला पर भारत की चुप्पी ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अभी भी जोखिम उठाने को तैयार नहीं है। इससे उसकी नैतिक साख को नुकसान पहुँचा है—और बिना नैतिक साख के कोई भी देश वैश्विक नेता नहीं बन सकता।

अमेरिकी मित्रता: सहयोग या अनुशासन

American Friendship: Partnership or Discipline?

अमेरिका भारत को रणनीतिक साझेदार कहता है, लेकिन इस साझेदारी की शर्तें स्पष्ट हैं। रक्षा सौदे, तकनीकी सहयोग, QUAD जैसे मंच—ये सभी अवसर भी हैं और सीमाएँ भी। अमेरिका चाहता है कि भारत उसके साथ रहे, लेकिन उसकी शर्तों पर।

इस मित्रता के बदले अपेक्षा यह है कि भारत कुछ मुद्दों पर बोले नहीं, कुछ देशों पर सवाल न उठाए और कुछ कार्रवाइयों को “आंतरिक मामला” कहकर टाल दे। यही वह बिंदु है जहाँ मित्रता अनुशासन में बदल जाती है। इतिहास गवाह है कि अमेरिका मित्रों को भी तभी तक स्वीकार करता है, जब तक वे आज्ञाकारी हों।

तटस्थता का भ्रम: संतुलन बनाम दिशाहीनता

The Illusion of Neutrality: Balance vs Directionlessness

भारत आज हर मोर्चे पर तटस्थ रहने की कोशिश कर रहा है। रूस–यूक्रेन युद्ध हो या पश्चिम एशिया का संकट, भारत संतुलन साधने की भाषा बोलता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संतुलन और दिशाहीनता के बीच की रेखा बहुत पतली होती है।

जब तटस्थता सिद्धांत से नहीं, डर से आती है, तो वह सम्मान नहीं दिलाती। आज भारत की तटस्थता को कई देश संतुलन नहीं, बल्कि अनिश्चितता के रूप में देख रहे हैं। और अनिश्चित देश पर भरोसा नहीं किया जाता—उसे केवल इस्तेमाल किया जाता है।

भारत के सामने विकल्प: सुविधा या नेतृत्व

India’s Choice: Convenience or Leadership

भारत के सामने आज स्पष्ट विकल्प है। वह या तो अमेरिका का सुविधाजनक साझेदार बना रहे—जो दबाव में चुप रहता है और लाभ में सहयोग करता है—या फिर वह Global South का वास्तविक नेता बने, जो सही और गलत पर स्पष्ट बोलता है, चाहे उसकी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।

वेनेजुएला पर बोलना केवल एक देश के समर्थन का सवाल नहीं है; यह उस सिद्धांत का सवाल है कि क्या भारत लोकतांत्रिक संप्रभुता के उल्लंघन का विरोध करेगा या नहीं। आज यदि भारत नहीं बोलेगा, तो कल जब उस पर सवाल उठेंगे, तब उसके पास नैतिक आधार नहीं बचेगा।

निष्कर्ष: चुप्पी सबसे खतरनाक नीति है

Conclusion: Silence Is the Most Dangerous Policy

वेनेजुएला भारत नहीं है।

मोदी मादुरो नहीं हैं।

लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि साम्राज्य पहले कमजोर को नहीं, स्वतंत्र को नियंत्रित करना चाहते हैं। भारत की चुप्पी, उसकी सावधानी और उसकी तटस्थता—इन सबको दुनिया पढ़ रही है। सवाल यह है कि भारत खुद को कैसे पढ़ता है।

अगर भारत Global South का नेता बनना चाहता है, तो उसे बोलना सीखना होगा—खासकर तब, जब बोलना असहज हो। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सबसे पहले वही देश निशाने पर आते हैं, जो यह मान लेते हैं कि चुप रहकर वे बच जाएंगे।

चुप्पी कभी सुरक्षा नहीं देती।

वह केवल यह बताती है कि अगला नंबर किसका हो सकता है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दशरथ मांझी : "माउंटेन मैन"

कश्मीर के रास्ते ही सुलझेगी कश्मीर समस्या

ब्रिटिश लोकतंत्र और बहुलता वाद का खोखलापन