लिच्छवी गणराज्य से आधुनिक भारतीय गणराज्य तक : भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा का विकास
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1. प्राचीन भारत में गणराज्य की अवधारणा
प्राचीन भारतीय राजनीतिक व्यवस्था केवल राजतंत्र तक सीमित नहीं थी। वैदिक और उत्तर-वैदिक काल में अनेक स्थानों पर गण और संघ आधारित शासन प्रणालियाँ प्रचलित थीं। ऋग्वेद में ‘सभा’ और ‘समिति’ का उल्लेख मिलता है, जो सामूहिक विमर्श और निर्णय की संस्थाएँ थीं। उत्तर वैदिक काल तक आते-आते ये संस्थाएँ अधिक संगठित हुईं और महाजनपद काल में कई गणराज्य अस्तित्व में आए।
प्रसिद्ध गणराज्यों में शाक्य, मल्ल, कोलिय, मोरिय और लिच्छवी प्रमुख थे। इन गणराज्यों में सत्ता किसी एक व्यक्ति के हाथ में न होकर एक परिषद या सभा में निहित होती थी। यह व्यवस्था प्राचीन भारत की लोकतांत्रिक चेतना को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
2. लिच्छवी गणराज्य : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
लिच्छवी गणराज्य ईसा पूर्व छठी शताब्दी में विद्यमान था। इसकी राजधानी वैशाली थी, जो उस समय एक समृद्ध, सुव्यवस्थित और सांस्कृतिक रूप से उन्नत नगर था। लिच्छवी गणराज्य वज्जि संघ का प्रमुख घटक था। वज्जि संघ में आठ गण सम्मिलित थे, जिनमें लिच्छवी सबसे प्रभावशाली थे।
इतिहासकारों के अनुसार लिच्छवी शासन व्यवस्था अत्यंत संगठित थी। यहाँ लगभग 7707 राजा (राजन्य) माने जाते थे, जो वस्तुतः गणसभा के सदस्य थे। ये सभी मिलकर राज्य के महत्वपूर्ण निर्णय लेते थे। यह तथ्य स्पष्ट करता है कि सत्ता का केंद्रीकरण न होकर सामूहिक शासन प्रणाली प्रचलित थी।
3. लिच्छवी शासन व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ
(क) गणसभा और निर्णय प्रक्रिया
लिच्छवी गणराज्य की सर्वोच्च संस्था गणसभा थी। सभी महत्वपूर्ण निर्णय—युद्ध, संधि, कर व्यवस्था, न्याय—सभा में विचार-विमर्श के बाद लिए जाते थे। निर्णय बहुमत के आधार पर होता था, जो आधुनिक लोकतंत्र की मूल भावना से मेल खाता है।
(ख) निर्वाचित नेतृत्व
लिच्छवी गणराज्य में गणमुख्य या महासेनापति का चयन सभा द्वारा किया जाता था। यह पद वंशानुगत नहीं था, बल्कि योग्यता और समर्थन पर आधारित था।
(ग) कानून और अनुशासन
लिच्छवी लोग नियमों और कानूनों के प्रति अत्यंत सजग थे। बौद्ध ग्रंथों में वर्णित है कि वज्जि संघ तब तक अजेय रहेगा, जब तक वह अपने नियमों का पालन करता रहेगा।
(घ) सामाजिक सहिष्णुता
लिच्छवी गणराज्य धार्मिक सहिष्णुता का केंद्र था। बौद्ध और जैन धर्म को यहाँ संरक्षण मिला। स्त्रियों को अपेक्षाकृत सम्मानजनक स्थान प्राप्त था, जो उस काल की प्रगतिशील सोच को दर्शाता है।
4. बुद्ध और महावीर का लिच्छवी गणराज्य से संबंध
गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी दोनों का लिच्छवी क्षेत्र से गहरा संबंध रहा। वैशाली बौद्ध धर्म का एक प्रमुख केंद्र था। महावीर की माता त्रिशला लिच्छवी कुल से थीं। इन दोनों महापुरुषों की शिक्षाओं में समानता, अहिंसा और सहभागिता के मूल्य मिलते हैं, जो लिच्छवी गणराज्य की लोकतांत्रिक भावना को और सुदृढ़ करते हैं।
5. गणराज्यों का पतन
समय के साथ गणराज्य कमजोर पड़ने लगे। मौर्य साम्राज्य के उदय के बाद शक्तिशाली केंद्रीकृत राजतंत्र का प्रभाव बढ़ा। इसके प्रमुख कारण थे—
- सैन्य शक्ति का अभाव
- आंतरिक मतभेद
- संगठित साम्राज्यों का उदय
हालाँकि गणराज्य समाप्त हो गए, परंतु उनकी लोकतांत्रिक चेतना पूर्णतः लुप्त नहीं हुई।
6. मध्यकालीन भारत और लोकतांत्रिक अवशेष
मध्यकाल में भारत में सुल्तनत और मुग़ल शासन रहा, जो मूलतः राजतंत्रीय थे। इसके बावजूद ग्राम पंचायतें, जातीय सभाएँ और व्यापारिक संघ स्थानीय स्तर पर निर्णय लेते रहे। पंचायत व्यवस्था ने लोकतंत्र की लौ को बुझने नहीं दिया।
7. औपनिवेशिक काल और आधुनिक लोकतंत्र की नींव
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं का विकास हुआ। विधान परिषदें, चुनाव प्रणाली, प्रेस और राजनीतिक दल अस्तित्व में आए। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने लोकतंत्र को जनआंदोलन का रूप दिया। स्वराज की अवधारणा मूलतः आत्मशासन और जनसत्ता पर आधारित थी।
8. स्वतंत्रता और भारतीय संविधान
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ। भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बना। संविधान ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, मौलिक अधिकार, स्वतंत्र न्यायपालिका और संघीय व्यवस्था की स्थापना की।
9. लिच्छवी गणराज्य और आधुनिक भारतीय गणराज्य : तुलनात्मक अध्ययन
लिच्छवी गणराज्य में प्रत्यक्ष लोकतंत्र था, जबकि आधुनिक भारत में प्रतिनिधि लोकतंत्र है। दोनों में समानता यह है कि सत्ता का स्रोत जनता है। गणसभा और संसद, गणमुख्य और प्रधानमंत्री—इन सभी में ऐतिहासिक निरंतरता दिखाई देती है।
लिच्छवी गणराज्य से आधुनिक भारतीय गणराज्य तक की यात्रा यह सिद्ध करती है कि लोकतंत्र भारत की अपनी मौलिक परंपरा है। आधुनिक भारतीय गणराज्य, प्राचीन भारतीय गणराज्य परंपरा का ही विकसित और संवैधानिक रूप है। वैशाली में बोया गया लोकतंत्र का बीज आज नई दिल्ली में एक विशाल वटवृक्ष के रूप में खड़ा है।
भारत का गणराज्य अतीत और वर्तमान के बीच एक सशक्त सेतु है, जो यह स्मरण कराता है कि लोकतंत्र भारत की आत्मा में रचा-बसा है।

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