निर्वाचित राष्ट्रपति का अपहरण : मादुरो

 

क्या यह युद्ध नहीं है?

(वेनेज़ुएला और आधुनिक साम्राज्यवादी आक्रामकता का प्रश्न)**

भूमिका: युद्ध की बदली हुई परिभाषा



इक्कीसवीं सदी में युद्ध अब वैसा नहीं रहा, जैसा बीसवीं सदी में समझा जाता था। अब युद्ध की शुरुआत न तो तोपों की गर्जना से होती है, न ही सीमाओं पर सेनाओं की औपचारिक तैनाती से। आज युद्ध अक्सर अदालतों, प्रतिबंधों, गिरफ्तारी वारंटों, आर्थिक नाकेबंदियों और “लोकतंत्र बचाने” की नैतिक भाषा में लड़ा जाता है। यह युद्ध कम दिखाई देता है, लेकिन अधिक गहराई तक असर करता है।

ऐसे समय में एक प्रश्न असहज होकर सामने खड़ा होता है—

यदि किसी लोकतांत्रिक देश के निर्वाचित राष्ट्रपति को बलपूर्वक हिरासत में लिया जाए, जेल में डाला जाए और किसी विदेशी अदालत में पेश किया जाए, तो इसे क्या कहा जाए?

क्या यह कूटनीति है?

क्या यह कानून का शासन है?

या फिर यह युद्ध का ही एक नया, अधिक परिष्कृत और अधिक खतरनाक रूप है?

वेनेज़ुएला का संदर्भ इसी प्रश्न को वैश्विक विमर्श के केंद्र में ले आता है।

1. युद्ध केवल बम नहीं होता: अंतरराष्ट्रीय कानून का मूल सिद्धांत

संयुक्त राष्ट्र चार्टर (UN Charter) के अनुच्छेद 2(4) के अनुसार किसी भी राज्य को दूसरे राज्य की संप्रभुता, राजनीतिक स्वतंत्रता या क्षेत्रीय अखंडता के विरुद्ध बल प्रयोग करने से रोका गया है। अक्सर “बल” शब्द को केवल सैन्य बल के रूप में समझा जाता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विधि में यह समझ बहुत संकीर्ण मानी जाती है।

राजनीतिक विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय कानून के विद्वानों के अनुसार “बल” में यह भी शामिल है:

राज्य की वैध सत्ता को निष्क्रिय करना

शासन के केंद्र को बाहर से नियंत्रित करना

जनता के लोकतांत्रिक निर्णय को अमान्य बना देना

जब किसी देश की राजनीतिक कमान ही छीन ली जाए, तो वहाँ युद्ध के लिए टैंक भेजने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।

2. संप्रभु प्रतिरक्षा और राष्ट्राध्यक्ष की स्थिति

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में एक बुनियादी सिद्धांत है—

कार्यरत राष्ट्राध्यक्ष को संप्रभु प्रतिरक्षा (Sovereign Immunity) प्राप्त होती है।

इसका आशय यह है कि:

कोई भी राष्ट्राध्यक्ष

किसी दूसरे देश की घरेलू अदालत के अधिकार क्षेत्र में

तब तक नहीं लाया जा सकता

जब तक कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा मान्य कोई स्पष्ट और वैध प्रक्रिया न अपनाई जाए।

ऐसी वैध प्रक्रिया में सामान्यतः शामिल होते हैं:

अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) का वारंट

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्वीकृति

संबंधित देश की सहमति और प्रत्यर्पण की विधिक प्रक्रिया

इनमें से किसी भी शर्त के बिना यदि किसी निर्वाचित राष्ट्रपति को हिरासत में लिया जाता है, तो वह “कानून” नहीं, बल्कि शक्ति का नग्न प्रयोग कहलाता है।

3. “कानूनी कार्रवाई” का भ्रम

अक्सर ऐसी कार्रवाइयों को “कानूनी प्रक्रिया” का नाम देकर वैध ठहराने की कोशिश की जाती है। लेकिन यहाँ एक मूल प्रश्न उठता है—

क्या किसी देश का घरेलू कानून दूसरे संप्रभु देश के लोकतांत्रिक निर्णय को रद्द कर सकता है?

यदि उत्तर “हाँ” है, तो फिर संप्रभुता की पूरी अवधारणा ही समाप्त हो जाती है।

और यदि उत्तर “नहीं” है, तो ऐसी हर कार्रवाई को कानून नहीं, बल्कि आक्रामकता कहा जाना चाहिए।

यहाँ कानून का उपयोग न्याय के लिए नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन के औज़ार के रूप में किया जाता है। यही कारण है कि इसे कई विद्वान Judicial Warfare या Lawfare कहते हैं।

4. अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष? शब्दों का धोखा

वेनेज़ुएला जैसे मामलों में अक्सर कहा जाता है कि यह “अप्रत्यक्ष” या “हाइब्रिड” युद्ध है। लेकिन यह शब्दावली स्वयं वास्तविकता को धुंधला करती है।

किसी देश की अर्थव्यवस्था पर हमला अप्रत्यक्ष हो सकता है।

किसी देश की सूचना व्यवस्था को प्रभावित करना अप्रत्यक्ष हो सकता है।

लेकिन देश के राष्ट्रपति को निशाना बनाना कभी अप्रत्यक्ष नहीं होता।

यह रणनीति कहलाती है: Decapitation Strategy

अर्थात—राज्य के मस्तिष्क पर सीधा आघात।

जब किसी देश का नेतृत्व ही बाहर से नियंत्रित या निष्क्रिय कर दिया जाए, तो उस देश की सेना, संसद, न्यायपालिका और प्रशासन स्वतः ही पंगु हो जाते हैं।

5. परिणामों की कसौटी पर युद्ध की पहचान

यदि हम युद्ध को उसके परिणामों से पहचानें, तो कुछ प्रश्न अनिवार्य हो जाते हैं:

क्या उस देश की राजनीतिक स्वतंत्रता बनी रहती है?

क्या जनता का मतदान अंतिम निर्णय रह जाता है?

क्या शासन अपने निर्णय स्वयं ले सकता है?

यदि इन तीनों का उत्तर “नहीं” है, तो फिर चाहे बम गिरें या न गिरें—

वह स्थिति शांति नहीं कहलाती।

ऐसी स्थिति में राज्य केवल नाम का राज्य रह जाता है; उसका वास्तविक नियंत्रण बाहर चला जाता है।

6. वेनेज़ुएला और संसाधन राजनीति

वेनेज़ुएला केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं है; वह विश्व के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक का स्वामी है। इतिहास बताता है कि जहाँ संसाधन होते हैं, वहाँ “लोकतंत्र”, “मानवाधिकार” और “कानून” की भाषा अक्सर सबसे तेज़ हो जाती है।

यह संयोग नहीं है कि संसाधन-समृद्ध देशों में ही:

शासन परिवर्तन की कोशिशें होती हैं

नेताओं को अपराधी घोषित किया जाता है

और जनता को बताया जाता है कि यह सब “उनकी भलाई” के लिए है

यह वही तर्क है जो औपनिवेशिक युग में दिया जाता था—बस शब्द बदल गए हैं।

7. वैश्विक दक्षिण के लिए संदेश

यदि किसी निर्वाचित राष्ट्रपति को इस प्रकार निशाना बनाया जा सकता है, तो संदेश केवल उस देश के लिए नहीं होता। यह संदेश पूरे Global South के लिए होता है:

“तुम चुनाव कर सकते हो,

लेकिन केवल तब तक

जब तक तुम्हारा चुनाव

वैश्विक शक्ति-संतुलन को चुनौती न दे।”

यह लोकतंत्र का नहीं, बल्कि अनुमत लोकतंत्र (Permitted Democracy) का मॉडल है—जहाँ संप्रभुता सशर्त होती है।

8. भारत, ईरान और अन्य देशों के लिए चेतावनी

आज यह प्रश्न केवल वेनेज़ुएला का नहीं है।

जो भी देश स्वतंत्र विदेश नीति, संसाधनों पर नियंत्रण या बहुध्रुवीय विश्व की बात करता है, वह इस मिसाल को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।

यदि एक देश का राष्ट्रपति इस तरह निशाना बन सकता है, तो कल यह तर्क किसी और पर भी लागू किया जा सकता है। यही कारण है कि यह मुद्दा केवल लैटिन अमेरिका तक सीमित नहीं रहता।

निष्कर्ष: बिना युद्ध घोषणा का युद्ध

अब प्रश्न को फिर से दोहराना चाहिए:

यदि किसी लोकतांत्रिक देश के निर्वाचित राष्ट्रपति को उठाकर जेल में डाला जाए और विदेशी अदालत में पेश किया जाए, तो इसे क्या कहा जाए?

यह न तो सामान्य कूटनीति है,

न ही सामान्य कानूनी प्रक्रिया,

और न ही केवल अप्रत्यक्ष दबाव।

यह राज्य की संप्रभुता पर सीधा, आक्रामक और निर्णायक प्रहार है।

यह युद्ध है—

बिना युद्ध घोषणा के,

बिना बमबारी के,

लेकिन लोकतंत्र के केंद्र पर किया गया

सबसे गहरा हमला।

युद्ध की पहचान हथियारों से नहीं,

बल्कि सत्ता के अपहरण से होती है।

और जब सत्ता का अपहरण हो जाए,

तो शांति केवल एक भ्रम रह जाती है।

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