South Asia as the New Middle East: India in the Role of Israel amid a Converging Global Hostility
दक्षिण एशिया : नया मध्य पूर्व — वैश्विक शक्तियों के दबाव में इज़राइल की भूमिका में भारत
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| South Asia |
Introduction: The Return of the Permanent Conflict Model
प्रस्तावना : स्थायी संघर्ष मॉडल की वापसी
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में विश्व राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहाँ युद्ध और शांति के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय नियंत्रित संघर्ष, सीमित युद्ध, प्रॉक्सी वार और नैरेटिव वॉर अब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के स्थायी औज़ार बन चुके हैं। इस परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो गया है कि क्या दक्षिण एशिया को जानबूझकर ‘नया मध्य पूर्व’ बनाया जा रहा है और क्या भारत को उस इज़राइल जैसी भूमिका में धकेला जा रहा है, जहाँ वह लगातार संघर्ष में फँसा रहे—फर्क बस इतना होगा कि इज़राइल के पीछे पश्चिमी दुनिया खड़ी रही, जबकि भारत के मामले में अमेरिका, चीन और यूरोप सहित लगभग सभी शक्तियाँ उसके विरोधियों के पीछे खड़ी दिखाई दें।
यह लेख किसी सनसनी या षड्यंत्र सिद्धांत का प्रचार नहीं करता, बल्कि वैश्विक राजनीति की संरचना, शक्तियों के हितों और भारत की वर्तमान स्थिति का यथार्थवादी विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
What Is the Middle East Model of Geopolitics?
भू-राजनीति में ‘मध्य पूर्व मॉडल’ क्या है?
‘मध्य पूर्व मॉडल’ से आशय उस भू-राजनीतिक व्यवस्था से है जिसमें किसी क्षेत्र को स्थायी अस्थिरता की अवस्था में रखा जाता है। यहाँ युद्ध पूरी तरह समाप्त नहीं होते, शांति पूरी तरह स्थापित नहीं होती और संघर्ष एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होता रहता है। इस मॉडल की विशेषताएँ हैं—प्रॉक्सी युद्ध, बाहरी हस्तक्षेप, धार्मिक‑वैचारिक विभाजन, हथियारों की निरंतर आपूर्ति और मीडिया व कूटनीति के माध्यम से नैरेटिव नियंत्रण।
मध्य पूर्व में इज़राइल‑फिलिस्तीन संघर्ष, ईरान‑सऊदी प्रतिद्वंद्विता, सीरिया और यमन के युद्ध इस मॉडल के जीवंत उदाहरण हैं। इन संघर्षों ने किसी एक शक्ति को निर्णायक विजेता नहीं बनाया, बल्कि बाहरी शक्तियों को निरंतर प्रभाव बनाए रखने का अवसर दिया।
Why South Asia Is the Next Strategic Battleground
दक्षिण एशिया अगला रणनीतिक रणक्षेत्र क्यों बन रहा है?
दक्षिण एशिया विश्व की लगभग एक‑चौथाई जनसंख्या, परमाणु हथियारों से लैस राष्ट्रों, समुद्री व्यापार मार्गों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं का केंद्र है। भारत, पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका—ये सभी देश किसी न किसी रूप में वैश्विक शक्तियों की रणनीतियों से जुड़े हैं।
चीन के उदय, भारत की बढ़ती आर्थिक‑सैन्य क्षमता और अमेरिका के घटते एकाधिकार ने इस क्षेत्र को प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा बना दिया है। दक्षिण एशिया को अस्थिर रखकर न केवल भारत के उदय को सीमित किया जा सकता है, बल्कि चीन और अमेरिका दोनों अपने‑अपने हित साध सकते हैं।
India as a Civilization-State, Not a Client State
भारत : एक सभ्यतागत राज्य, किसी का क्लाइंट स्टेट नहीं
भारत केवल एक आधुनिक राष्ट्र‑राज्य नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सभ्यतागत निरंतरता वाला राज्य है। यही कारण है कि भारत को किसी भी वैश्विक खांचे में फिट करना कठिन रहा है। अमेरिका उसे अपना रणनीतिक साझेदार बनाना चाहता है, चीन उसे नियंत्रित प्रतिद्वंद्वी, और यूरोप उसे एक बड़ा बाज़ार मानता है।
समस्या यह है कि भारत किसी का ‘क्लाइंट स्टेट’ बनने को तैयार नहीं। यही स्वायत्तता उसे असुविधाजनक बनाती है और यही कारण है कि विभिन्न शक्तियाँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारत पर दबाव बनाए रखने की नीति अपनाती हैं।
Israel and India: Strategic Parallels and Critical Differences
इज़राइल और भारत : रणनीतिक समानताएँ और निर्णायक अंतर
इज़राइल और भारत के बीच कुछ सतही समानताएँ हैं—लगातार सुरक्षा चुनौतियाँ, शत्रुतापूर्ण पड़ोस और सीमित संसाधनों में रक्षा क्षमता का विकास। लेकिन निर्णायक अंतर भी हैं। इज़राइल एक छोटा राष्ट्र है, जिसकी सुरक्षा पश्चिमी समर्थन पर निर्भर रही है। भारत एक विशाल देश है, जिसे अपनी सुरक्षा स्वयं सुनिश्चित करनी होती है।
इज़राइल के संघर्षों में पश्चिम खुलकर उसके साथ खड़ा रहा। भारत के मामले में स्थिति उलट है—पाकिस्तान को चीन का समर्थन, मानवाधिकार के नाम पर पश्चिमी दबाव और वैश्विक मीडिया में नकारात्मक नैरेटिव।
China’s Strategy: Winning Without Declaring War
चीन की रणनीति : युद्ध घोषित किए बिना जीत
चीन की रणनीति को यदि एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है—"लड़ाई से पहले ही विरोधी को थका देना"। भारत के संदर्भ में चीन की नीति कभी भी सीधे युद्ध की नहीं रही, बल्कि निरंतर दबाव, सीमित उकसावे और दीर्घकालिक रणनीतिक घेराबंदी की रही है।
सीमा विवाद इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव को पूरी तरह युद्ध में बदलने के बजाय चीन उसे नियंत्रित स्तर पर बनाए रखता है। इससे भारत को लगातार सैन्य संसाधन झोंकने पड़ते हैं, जबकि चीन वैश्विक मंच पर स्वयं को शांतिप्रिय शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता रहता है।
आर्थिक मोर्चे पर चीन भारतीय बाज़ार में गहरी पैठ बनाकर निर्भरता पैदा करता है। फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल और कच्चे माल के क्षेत्र में चीन की भूमिका भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को सीमित करती है। इसके साथ ही नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भारी निवेश करके चीन भारत को चारों ओर से रणनीतिक दबाव में रखता है।
चीन की यह रणनीति भारत को उसी स्थिति में लाने का प्रयास है, जिसमें वह लगातार सतर्क, प्रतिक्रियाशील और संसाधनों में बँधा रहे—ठीक वैसे ही जैसे मध्य पूर्व में इज़राइल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ता रहा है।
Pakistan as a Perpetual Proxy Instrument
पाकिस्तान : एक स्थायी प्रॉक्सी औज़ार
पाकिस्तान की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में केंद्रीय है। स्वतंत्रता के बाद से ही पाकिस्तान ने अपनी राष्ट्रीय पहचान भारत-विरोध पर आधारित की। प्रारंभ में उसे अमेरिका का संरक्षण मिला, जिसने शीत युद्ध में उसे एक रणनीतिक मोहरा बनाया। बाद में चीन ने उसी भूमिका को और अधिक संगठित रूप में आगे बढ़ाया।
आतंकवाद पाकिस्तान का सबसे प्रभावी हथियार रहा है। यह न केवल भारत को आंतरिक रूप से अस्थिर करता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को रक्षात्मक स्थिति में ला देता है। हर आतंकी घटना के बाद भारत को अपनी सफ़ाई देनी पड़ती है, जबकि प्रॉक्सी संचालक अक्सर पर्दे के पीछे सुरक्षित रहते हैं।
यह वही मॉडल है जो मध्य पूर्व में लंबे समय तक अपनाया गया—प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए प्रॉक्सी के माध्यम से स्थायी अस्थिरता। पाकिस्तान की आर्थिक विफलता के बावजूद उसका रणनीतिक महत्व इसी कारण बना हुआ है।
The United States: Partner, Balancer, or Strategic Gatekeeper?
अमेरिका : साझेदार, संतुलनकर्ता या रणनीतिक द्वारपाल?
अमेरिका और भारत के संबंध विरोधाभासों से भरे हैं। एक ओर अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफिक में चीन के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण साझेदार मानता है, दूसरी ओर वह नहीं चाहता कि भारत पूर्णतः स्वतंत्र वैश्विक शक्ति बने।
QUAD जैसे मंच भारत को सुरक्षा सहयोग देते हैं, लेकिन NATO जैसी प्रतिबद्धता नहीं। मानवाधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र के प्रश्नों पर अमेरिका समय-समय पर भारत पर दबाव बनाता है। यह दोहरा रवैया भारत को यह संकेत देता है कि समर्थन सशर्त है।
मध्य पूर्व में अमेरिका ने इज़राइल को खुला समर्थन दिया, जबकि भारत के मामले में वह संतुलन बनाकर चलना चाहता है—ताकि न चीन पूरी तरह जीते, न भारत पूरी तरह उभरे। यही नीति भारत को दीर्घकालिक संघर्ष की स्थिति में बनाए रख सकती है।
Europe’s Selective Morality and Narrative Warfare
यूरोप की चयनात्मक नैतिकता और नैरेटिव युद्ध
यूरोप स्वयं को मानवाधिकार और उदार मूल्यों का संरक्षक बताता है, लेकिन व्यवहार में उसकी नीतियाँ अक्सर उसके आर्थिक और रणनीतिक हितों से संचालित होती हैं। भारत के संदर्भ में यह चयनात्मक नैतिकता स्पष्ट दिखती है।
कश्मीर, नागरिकता कानून या आंतरिक राजनीतिक मुद्दों पर यूरोपीय संस्थाएँ मुखर आलोचना करती हैं, जबकि पाकिस्तान या चीन के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर अक्सर चुप्पी साध लेती हैं। यह नैरेटिव युद्ध भारत की वैश्विक छवि को प्रभावित करता है और उसे रक्षात्मक बनाता है।
मध्य पूर्व में भी यही मॉडल अपनाया गया—कुछ देशों को स्थायी खलनायक और कुछ को स्थायी पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करना।
The Convergence of Interests Against Indian Autonomy
भारतीय स्वायत्तता के विरुद्ध हितों का संयोग
यही इस पूरे परिदृश्य का सबसे खतरनाक पक्ष है—अमेरिका, चीन और यूरोप भले आपस में प्रतिस्पर्धी हों, लेकिन भारत की पूर्ण स्वायत्तता के प्रश्न पर उनके हित कई बार एक‑दूसरे से मिल जाते हैं।
Hybrid Warfare: The New Normal Against India
हाइब्रिड युद्ध : भारत के विरुद्ध नया सामान्य
आज का युद्ध केवल टैंकों और मिसाइलों तक सीमित नहीं है। भारत के विरुद्ध हाइब्रिड युद्ध के सभी तत्व सक्रिय हैं—साइबर हमले, फेक न्यूज़, आर्थिक दबाव, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बदनामी और आंतरिक सामाजिक तनाव।
सोशल मीडिया के माध्यम से समाज को विभाजित करना, संस्थानों पर अविश्वास पैदा करना और युवाओं में निराशा फैलाना—ये सभी आधुनिक युद्ध के औज़ार हैं। मध्य पूर्व में लंबे समय तक इसी रणनीति ने राज्यों को कमजोर किया।
यदि भारत इस युद्ध के स्वरूप को नहीं समझता, तो वह बिना औपचारिक युद्ध हारे ही कमजोर हो सकता है।
Internal Fragmentation as a Strategic Vulnerability
आंतरिक विखंडन : भारत की रणनीतिक कमजोरी
किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आंतरिक एकता होती है। भारत की विविधता उसकी ताकत भी है और यदि असंतुलित हो जाए तो कमजोरी भी। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर बढ़ते तनाव बाहरी शक्तियों के लिए अवसर बन जाते हैं।
इतिहास गवाह है कि मध्य पूर्व के अधिकांश देश बाहरी आक्रमण से पहले आंतरिक रूप से टूट चुके थे। यदि भारत अपनी आंतरिक बहसों को राष्ट्रीय सहमति में नहीं बदलता, तो बाहरी दबाव अधिक प्रभावी हो सकते हैं।
Global South: Leadership or Illusion?
ग्लोबल साउथ : नेतृत्व या भ्रम?
भारत स्वयं को ग्लोबल साउथ की आवाज़ के रूप में प्रस्तुत करता है। G20 शिखर सम्मेलन और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह भूमिका दिखाई भी देती है। लेकिन वास्तविक नेतृत्व केवल भाषणों से नहीं, बल्कि संकट के समय समर्थन से तय होता है।
अभी ग्लोबल साउथ भारत को नैतिक नेतृत्वकर्ता तो मानता है, लेकिन रणनीतिक सहारा नहीं। जब तक यह स्थिति नहीं बदलती, भारत को अकेले ही दबाव झेलना होगा—जैसे इज़राइल ने किया, पर बिना वैसा समर्थन पाए।
Can India Avoid Becoming the New Middle East?
क्या भारत ‘नया मध्य पूर्व’ बनने से बच सकता है?
भारत के पास अभी भी विकल्प हैं। पहला—रणनीतिक स्वायत्तता को केवल नारे के रूप में नहीं, बल्कि व्यवहार में लागू करना। दूसरा—आंतरिक एकता को राष्ट्रीय सुरक्षा का अंग मानना। तीसरा—आर्थिक आत्मनिर्भरता को वास्तविक रूप देना।
भारत को यह समझना होगा कि कोई भी वैश्विक शक्ति स्थायी मित्र नहीं होती। दीर्घकालिक सुरक्षा केवल आत्मनिर्भरता, संतुलित कूटनीति और सामाजिक स्थिरता से ही संभव है।
Conclusion: Israel’s Strength or the Middle East’s Fate?
निष्कर्ष : इज़राइल जैसी मजबूती या मध्य पूर्व जैसा भविष्य?
दक्षिण एशिया को नया मध्य पूर्व बनाना केवल एक संभावना नहीं, बल्कि एक सक्रिय भू-राजनीतिक प्रक्रिया दिखाई देती है। इस प्रक्रिया में भारत को इज़राइल जैसी भूमिका में देखा जा रहा है—लगातार संघर्ष, सीमित समर्थन और स्थायी दबाव।
लेकिन इतिहास नियति नहीं होता। भारत यदि अपनी सभ्यतागत चेतना, लोकतांत्रिक परिपक्वता और रणनीतिक विवेक को एक दिशा में साध ले, तो वह इस जाल को तोड़ सकता है।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि दुनिया भारत के साथ क्या करना चाहती है, बल्कि यह है कि भारत स्वयं अपने साथ क्या करना चाहता है। यदि उत्तर स्पष्ट है, तो भारत न तो नया मध्य पूर्व बनेगा और न ही किसी और की प्रयोगशाला।

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