अमेरिका का नया G20: White Genocide और BRICS की बढ़ती ताकत


विशेष लेख – 5 दिसंबर 2025


जोहान्सबर्ग से मियामी तक की दूरी सिर्फ 12,900 किलोमीटर नहीं है; यह आज के दौर में दो पूरी तरह अलग वैश्विक व्यवस्थाओं के बीच की दूरी बन चुकी है। 22-23 नवंबर 2025 को जोहान्सबर्ग में जब G20 का समिट चल रहा था, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की कुर्सियाँ खाली थीं। अमेरिका ने पहली बार किसी G20 समिट का पूर्ण बहिष्कार किया। और अब, एक हफ्ते बाद ही, व्हाइट हाउस ने घोषणा कर दी – 2026 का G20 समिट मियामी में होगा, लेकिन दक्षिण अफ्रीका को निमंत्रण नहीं भेजा जाएगा। उसकी जगह पोलैंड को “नया सदस्य” बनाया जा रहा है। अमेरिका इसे “New G20” कह रहा है। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने इसे “नस्लीय पूर्वाग्रह की वापसी” कहा है। BRICS के बाकी नौ पूर्ण सदस्यों ने इसे “वैश्विक दक्षिण के खिलाफ घोषित युद्ध” करार दिया है।यह सिर्फ एक कूटनीतिक झगड़ा नहीं है। यह 21वीं सदी के सबसे बड़े सवालों में से एक का खुला ऐलान है – क्या पश्चिमी दुनिया अब भी यह तय करेगी कि कौन सा देश “वैश्विक मेज” पर बैठने लायक है?व्हाइट जेनोसाइड” का नया नैरेटिवट्रंप प्रशासन का मुख्य आरोप यह है कि दक्षिण अफ्रीका में “सफेद किसानों का नरसंहार” (White Genocide) हो रहा है। यह दावा 2018 से चला आ रहा है, जब ट्रंप ने पहली बार ट्वीट किया था कि दक्षिण अफ्रीका सरकार सफेद किसानों की जमीन जब्त कर रही है और उन्हें मार रही है। पांच साल बाद भी यह दावा जस का तस है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय की 2025 की रिपोर्ट में लिखा है – “South Africa’s Expropriation Act 2024-25 discriminates on the basis of race and risks white minority genocide.”हकीकत इसके ठीक उलट है। दक्षिण अफ्रीका में 1994 के बाद से अब तक कुल 86 किसानों की हत्या हुई है (सभी नस्लों के), जबकि सालाना औसत हत्या दर 20,000 से ऊपर है। अफ्रीकानर संगठन AgriSA खुद कहता है कि “White Genocide” शब्द “एक मिथक है जिसे दक्षिणपंथी अमेरिकी मीडिया ने बढ़ावा दिया है।” फिर भी फरवरी 2025 में ट्रंप ने Executive Order 14204 जारी किया, जिसमें दक्षिण अफ्रीकी श्वेत किसानों को अमेरिका में शरणार्थी दर्जा देने और दक्षिण अफ्रीका को USAID की सारी सहायता रोकने का आदेश दिया गया।दक्षिण अफ्रीका के विदेश मंत्री रोनाल्ड लामोला ने प्रिटोरिया में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “यह वही अमेरिका है जिसने 1986 में अपार्टहाइड के खिलाफ सैंक्शन्स लगाए थे। आज वही अमेरिका अपार्टहाइड के अवशेषों को बचाने के लिए हमारे खिलाफ सैंक्शन्स लगा रहा है।”अपार्टहाइड का पुराना घाव और नया कानूनअपार्टहाइड के दौरान 87% जमीन श्वेत अल्पसंख्यकों (9% आबादी) के पास थी। 1994 में नेल्सन मंडेला की सरकार ने “Willing Buyer-Willing Seller” मॉडल अपनाया – सरकार बाजार भाव से जमीन खरीदकर गरीब काले लोगों में बांटेगी। 31 साल बाद भी सिर्फ 11% जमीन का हस्तांतरण हो पाया है। 2024 में संसद ने Expropriation Act पास किया, जिसके तहत “public interest” में बिना मुआवजे के भी जमीन ली जा सकती है – ठीक वैसे ही जैसे भारत में Land Acquisition Act 2013 है, या अमेरिका में Eminent Domain है।लेकिन अमेरिका और एलन मस्क (जो खुद जोहान्सबर्ग में पैदा हुए) ने इसे “नस्लीय जब्ती” बताया। मस्क ने X पर लिखा, “They are coming for white people’s land. History is repeating.” दक्षिण अफ्रीका के सांख्यिकी विभाग के अनुसार, आज भी 67% कृषि योग्य जमीन श्वेत किसानों के पास है। नया कानून अभी तक एक भी खेत पर लागू नहीं हुआ है।BRICS की चुप्पी नहीं, एकजुटताजब अमेरिका ने दक्षिण अफ्रीका को G20 से बाहर करने की घोषणा की, तो BRICS के बाकी नौ पूर्ण सदस्यों ने 48 घंटे के अंदर अलग-अलग बयान जारी किए।
  • चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा, “यह नस्लवाद का नया रूप है। हम दक्षिण अफ्रीका के साथ खड़े हैं।”
  • रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा, “यह G20 को G7 का विस्तार बनाने की कोशिश है। हम BRICS को और मजबूत करेंगे।”
  • भारत ने सतर्क लेकिन स्पष्ट बयान दिया – “G20 सभी सदस्यों का समावेशी मंच है। किसी भी देश को बाहर करना संस्था की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।”
  • ब्राजील के राष्ट्रपति लुला ने तो सीधे कहा, “अगर G20 से दक्षिण अफ्रीका बाहर है, तो 2027 में ब्राजील की मेजबानी में हम उसे विशेष अतिथि के रूप में बुलाएंगे।”
BRICS ने तुरंत कार्रवाई भी की। न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) ने 72 घंटे के अंदर दक्षिण अफ्रीका को 1.2 बिलियन डॉलर का आपातकालीन लोन मंजूर कर दिया, जिसे अमेरिका ने “चीन की कर्ज जाल नीति” कहा। दक्षिण अफ्रीका के वित्त मंत्री ईनोक गोडोंगवाना ने हंसते हुए कहा, “पहले IMF हमें कर्ज देता था और नीतियां थोपता था। अब NDB दे रहा है और हम खुद नीतियां बनाते हैं।”आर्थिक युद्ध की शुरुआतअमेरिका ने दक्षिण अफ्रीका को AGOA (African Growth and Opportunity Act) से बाहर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसका मतलब है कि दक्षिण अफ्रीका का अमेरिका को 7 बिलियन डॉलर का निर्यात (मुख्यतः ऑटोमोबाइल, फल, वाइन) 30-40% टैरिफ के दायरे में आएगा। जवाब में दक्षिण अफ्रीका ने कहा है कि वह BRICS+ देशों के साथ स्थानीय मुद्रा में व्यापार को 2026 तक 65% तक ले जाएगा। 2025 में यह आंकड़ा 28% था।चीन ने पहले ही घोषणा कर दी है कि वह दक्षिण अफ्रीका के बंदरगाहों में 4 बिलियन डॉलर का निवेश करेगा। रूस ने उरानियम और प्लेटिनम की खरीद दोगुनी कर दी है। भारत ने फार्मास्युटिकल्स और आईटी सर्विसेज में 2 बिलियन डॉलर का नया समझौता किया है।वैश्विक दक्षिण का नया केंद्रदक्षिण अफ्रीका अब सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि एक प्रतीक बन चुका है। अफ्रीकी यूनियन (AU) ने आपातकालीन बैठक बुलाई और कहा, “अगर दक्षिण अफ्रीका को G20 से निकाला जा सकता है, तो कल को नाइजीरिया, इंडोनेशिया या ब्राजील को भी निकाला जा सकता है।” 54 अफ्रीकी देशों ने संयुक्त बयान में अमेरिका की निंदा की।BRICS का अगला समिट 2026 में भारत में होना है। सूत्र बता रहे हैं कि भारत दक्षिण अफ्रीका को “विशेष पूर्ण सदस्य” का दर्जा देने पर विचार कर रहा है, ताकि उसे G20 से बाहर करने का कोई असर न पड़े। साथ ही, BRICS पेमेंट सिस्टम (जो XRP लेजर पर आधारित है) को जनवरी 2026 से पूरी तरह चालू करने की योजना है। इसका पहला बड़ा टेस्ट दक्षिण अफ्रीका के साथ व्यापार होगा।इतिहास दोहरा रहा है, या बदल रहा है?1980 के दशक में अमेरिका और ब्रिटेन ने अपार्टहाइड दक्षिण अफ्रीका का समर्थन किया था। रोनाल्ड रीगन और मार्गरेट थैचर ने नेल्सन मंडेला को “आतंकवादी” कहा था। 2025 में फिर वही देश (अ other नेतृत्व के साथ) दक्षिण अफ्रीका को सजा दे रहे हैं – इस बार अपार्टहाइड के बाद के सुधारों के लिए।लेकिन इस बार अंतर यह है कि दक्षिण अफ्रीका अकेला नहीं है। उसके साथ 10 पूर्ण BRICS सदस्य, 10 पार्टनर देश, और 134 देशों का “फ्रेंड्स ऑफ BRICS” ग्रुप है। जब 2001 में जिम ओ’नील ने BRIC शब्द गढ़ा था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि 25 साल बाद यह समूह G20 को ही चुनौती देगा।अंतिम सवालक्या 2026 में मियामी में होने वाला “New G20” वाकई वैश्विक होगा? या यह सिर्फ G7+कुछ का नया नाम होगा? और अगर दक्षिण अफ्रीका वाकई BRICS की छतरी में चला गया, तो क्या वह 1994 से अब तक की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभरेगा – जैसे चीन 1980 के बाद हुआ था?जोहान्सबर्ग की खाली कुर्सियां सिर्फ एक समिट की नहीं थीं। वे उस पुरानी विश्व व्यवस्था की खाली होती कुर्सियां थीं, जिसे अब वैश्विक दक्षिण अपने हाथ में ले रहा है। मियामी 2026 में जब कैमरे चलेंगे, तो दुनिया देखेगी कि असली G20 अब कहां बैठता है – मियामी के सम्मेलन कक्ष में नहीं, बल्कि दिल्ली, बीजिंग, ब्रासीलिया और प्रिटोरिया के बीच बनते नए गलियारों में।

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