दक्षिण एशिया में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: चीन और अमेरिका की भूमिका तथा उनके निवेशों का प्रभाव
दक्षिण एशिया (भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल आदि) में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और टकराव मुख्य रूप से आंतरिक कारकों से उत्पन्न होते हैं—जैसे धार्मिक पहचान, चुनावी राजनीति, ऐतिहासिक विभाजन (1947 का बंटवारा) और आर्थिक असमानता। हाल के वर्षों में भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर हमले, बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हिंसा (2024 की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद) और पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार बढ़े हैं। ये मुद्दे स्थानीय राजनीतिक अवसरवाद से प्रेरित हैं, जहां अल्पसंख्यकों को वोट बैंक या scapegoat बनाया जाता है (Carnegie Endowment और USIP रिपोर्ट्स, 2020-2025)।
चीन की भूमिका और निवेश (Belt and Road Initiative - BRI)
चीन दक्षिण एशिया में मुख्य रूप से आर्थिक निवेश के माध्यम से प्रभाव बढ़ा रहा है, विशेषकर BRI के तहत:
- पाकिस्तान: China-Pakistan Economic Corridor (CPEC) में अरबों डॉलर का निवेश, लेकिन बलोचिस्तान में जातीय असंतोष बढ़ा (Carnegie, 2021)।
- श्रीलंका: Hambantota पोर्ट जैसी परियोजनाएं, जो ऋण जाल का उदाहरण बनीं।
- नेपाल, बांग्लादेश: अवसंरचना निवेश, जो स्थानीय राजनीति को प्रभावित करते हैं।
चीन का उद्देश्य भारत की क्षेत्रीय प्रधानता को सीमित करना और अपना प्रभाव बढ़ाना है (USIP, 2020)। हालांकि, BRI परियोजनाएं कभी-कभी स्थानीय तनाव बढ़ाती हैं (जैसे भूमि अधिग्रहण से जातीय असंतोष), लेकिन ये मुख्य रूप से सांप्रदायिक (धार्मिक) ध्रुवीकरण से नहीं जुड़ीं। चीन स्थिरता चाहता है ताकि उसके निवेश सुरक्षित रहें; वह धार्मिक मुद्दों पर कम बोलता है (Global Times का फोकस Xinjiang पर)। उपलब्ध प्रमाणों से चीन का सांप्रदायिक टकरावों में सीधा प्रोत्साहन नहीं मिलता (Carnegie, 2021)।
अमेरिका की भूमिका और प्रभाव
अमेरिका दक्षिण एशिया में मानवाधिकार, अल्पसंख्यक अधिकार और लोकतंत्र संवर्धन पर जोर देता है:
- USCIRF (US Commission on International Religious Freedom): भारत को "Country of Particular Concern" मानता है, मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर हिंसा की रिपोर्ट करता है (USCIRF Annual Reports, 2022-2025)।
- USAID और NGO: अल्पसंख्यक अधिकारों, मीडिया साक्षरता और सिविल सोसाइटी के लिए फंडिंग, लेकिन कुछ देशों (भारत, पाकिस्तान) में इसे "हस्तक्षेप" या "regime change" की साजिश माना जाता है (2024 बांग्लादेश घटनाओं में आरोप)।
निवेशों का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर प्रभाव
- चीन के निवेश: BRI आर्थिक निर्भरता बढ़ाते हैं, जो राजनीतिक प्रभाव देता है, लेकिन धार्मिक विभाजन को सीधे प्रोत्साहित नहीं करते। अप्रत्यक्ष रूप से, परियोजनाएं स्थानीय असंतोष (जातीय/क्षेत्रीय) बढ़ा सकती हैं, जो कभी धार्मिक रंग ले लेता है (पाकिस्तान के बलोचिस्तान में)।
- अमेरिकी निवेश/सहायता: मुख्य रूप से विकास और मानवाधिकार पर, जो अल्पसंख्यक सुरक्षा को बढ़ावा देते हैं। लेकिन रिपोर्ट्स (USCIRF) और फंडिंग को कुछ सरकारें "बाहरी हस्तक्षेप" मानती हैं, जो घरेलू ध्रुवीकरण बढ़ा सकता है।
चीन-अमेरिका प्रतिस्पर्धा (proxy competition) दक्षिण एशिया में प्रभाव बढ़ाने की है, लेकिन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण मुख्य रूप से स्थानीय है (Carnegie, 2025)। बाहरी शक्तियां कमजोरियों का फायदा उठाती हैं, लेकिन जड़ें आंतरिक हैं।
निष्कर्ष: संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता
दक्षिण एशिया में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को रोकने के लिए आंतरिक सुधार जरूरी हैं—निष्पक्ष प्रशासन, समावेशी राजनीति और मीडिया साक्षरता। चीन और अमेरिका दोनों के निवेश लाभदायक हो सकते हैं, लेकिन पारदर्शिता और स्थानीय हितों का सम्मान आवश्यक है। उपलब्ध प्रमाण (Carnegie, USIP, USCIRF) से कोई भी देश सीधे सांप्रदायिक टकराव नहीं भड़काता; ये मुख्य रूप से भूराजनीतिक हितों से प्रेरित हैं। क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सभी पक्षों को संवाद बढ़ाना चाहिए।


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