बांग्लादेश संकट: चीन और अमेरिका का संयुक्त उपक्रम?

 

बांग्लादेश संकट: चीन और अमेरिका का संयुक्त उपक्रम

दक्षिण एशिया में बांग्लादेश की 2024 क्रांति (जुलाई-अगस्त 2024) ने शेख हसीना की 15 वर्षीय सरकार का अंत किया, जिसके बाद 2025 में राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक चुनौतियां और अल्पसंख्यक हिंसा जारी रही। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने सुधारों का वादा किया, लेकिन संकट मुख्य रूप से आंतरिक कारकों—बेरोजगारी, सरकारी दमन और लोकतंत्र की कमी—से उपजा। कुछ विश्लेषणों में इसे चीन और अमेरिका की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का अप्रत्यक्ष परिणाम माना जाता है, जहां दोनों महाशक्तियां अपने हितों (आर्थिक प्रभाव बनाम लोकतंत्र संवर्धन) को आगे बढ़ा रही हैं। हालांकि, उपलब्ध शोध से "संयुक्त उपक्रम" का सीधा प्रमाण नहीं मिलता; बल्कि प्रतिस्पर्धा प्रमुख है। भारत, क्षेत्र का सबसे बड़ा पड़ोसी, इस अस्थिरता से सबसे अधिक प्रभावित होता है, जहां सीमा सुरक्षा और भूराजनीतिक संतुलन खतरे में हैं।

सांप्रदायिक और राजनीतिक टकराव: स्थानीय जड़ें

बांग्लादेश संकट की जड़ें मुख्य रूप से आंतरिक हैं:

  • छात्र आंदोलन नौकरी कोटा सुधार से शुरू हुआ, लेकिन सरकारी हिंसा (संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट: 1,400 से अधिक मौतें) ने इसे राष्ट्रव्यापी विरोध में बदल दिया।
  • ऐतिहासिक विभाजन (1971 स्वतंत्रता), राजनीतिक ध्रुवीकरण और भ्रष्टाचार ने सामाजिक तनाव बढ़ाया, जहां अल्पसंख्यकों (हिंदू, बौद्ध) पर हमले राजनीतिक बदले के रूप में हुए (2025 तक 2,442 घटनाएं, लेकिन 98% राजनीतिक)।
  • चुनावी अवसरवाद (2026 चुनावों की तैयारी) और प्रशासनिक कमजोरियां बाहरी शक्तियों के लिए अवसर पैदा करती हैं।

ये कारक संकट को बढ़ाते हैं, लेकिन बाहरी प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से इसमें योगदान देते हैं।

चीन की भूमिका: आर्थिक और रणनीतिक दबाव

चीन बांग्लादेश में अपने प्रभाव को मजबूत कर रहा है, मुख्य रूप से बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के माध्यम से:

  • 2024 क्रांति के बाद $3 बिलियन निवेश, जिसमें 2025 में $2.1 बिलियन इंफ्रा डील्स (Mongla पोर्ट आधुनिकीकरण, Teesta प्रोजेक्ट) शामिल। कुल BRI निवेश $20 बिलियन से अधिक, जैसे Padma ब्रिज और Payra डीप-सी पोर्ट।
  • सैन्य सहायता: 2019-2023 में 70-72% हथियार चीन से, 2025 में 20 J-10CE फाइटर जेट्स की रुचि।
  • उद्देश्य: भारत की क्षेत्रीय प्रधानता को संतुलित करना और बंगाल की खाड़ी में पकड़ मजबूत करना (Malacca Strait नियंत्रण)। चीन सीधे सांप्रदायिक टकराव में नहीं फंसता, लेकिन अस्थिरता से लाभ उठाता है, जैसे सभी पार्टियों (BNP, Jamaat) से संपर्क।

चीन स्थिरता चाहता है ताकि उसके निवेश सुरक्षित रहें, लेकिन 2025 में अमेरिकी सहायता कटौती का फायदा उठाया।

अमेरिका की भूमिका: मानवाधिकार और सहायता पर ध्यान

अमेरिका लोकतंत्र और मानवाधिकार पर जोर देता है:

  • हसीना सरकार पर आलोचना (USCIRF, RAB पर प्रतिबंध), 2025 में USAID प्रोजेक्ट्स बंद ($700 मिलियन नुकसान, 50,000 नौकरियां गईं)। कुल विकास सहायता $300 मिलियन से अधिक।
  • राजनीतिक समर्थन: यूनुस (अंतरिम प्रमुख) और BNP को बैकिंग, चुनाव पर्यवेक्षक और St. Martin Island पर सैन्य बेस रुचि (बंगाल की खाड़ी नियंत्रण)।
  • अप्रत्यक्ष प्रभाव: सांप्रदायिक हिंसा रिपोर्टिंग और राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा, लेकिन मुख्य रूप से चीन के प्रभाव को सीमित करने के लिए (Indo-Pacific रणनीति)।

कुछ स्रोत "unholy alliance" बताते हैं जहां दोनों BNP को समर्थन देकर अस्थिरता पैदा करते हैं, लेकिन शोध से यह प्रतिस्पर्धी लगता है।

सांप्रदायिक अस्थिरता में भारत को सबसे अधिक खतरा

भारत बांग्लादेश का मुख्य पड़ोसी है और क्षेत्रीय स्थिरता का दावेदार:

  • संकट से प्रभाव: अवैध प्रवासन, मानव तस्करी, आतंकवाद (इस्लामिस्ट उभार), और व्यापार बाधाएं (2025 में वीजा सेंटर बंद)।
  • भूराजनीतिक: चीन-पाकिस्तान प्रभाव बढ़ा (Mongla पोर्ट, Teesta), भारत की Bay of Bengal प्रभाव कमजोर। 2025 में ट्रंप की टैरिफ्स (भारत पर 50%) ने क्षेत्रीय गठबंधनों को प्रभावित किया।
  • भारत को सबसे अधिक भार: जबकि चीन और अमेरिका रणनीतिक लाभ उठाते हैं, भारत 1971 के बाद सबसे बड़े चुनौती का सामना कर रहा है।

निष्कर्ष: संयुक्त रणनीति और आंतरिक सुधार की जरूरत

बांग्लादेश संकट मुख्य रूप से स्थानीय अस्थिरता और कमजोर प्रशासन से है। चीन और अमेरिका अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं—चीन आर्थिक निवेश से, अमेरिका सहायता और लोकतंत्र से—लेकिन "संयुक्त" का प्रमाण सीमित (कुछ में BNP समर्थन)। भारत को मजबूत सीमाएं, सक्रिय कूटनीति और स्थानीय सुधारों में सहयोग से स्थिरता बनानी होगी। सारांश में, यह चीन-अमेरिका प्रतिस्पर्धा का अप्रत्यक्ष परिणाम है, जिसका भार भारत पर पड़ता है।

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