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South Asia as the New Middle East: India in the Role of Israel amid a Converging Global Hostility

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  दक्षिण एशिया : नया मध्य पूर्व — वैश्विक शक्तियों के दबाव में इज़राइल की भूमिका में भारत South Asia  Introduction: The Return of the Permanent Conflict Model प्रस्तावना : स्थायी संघर्ष मॉडल की वापसी इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में विश्व राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहाँ युद्ध और शांति के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय नियंत्रित संघर्ष, सीमित युद्ध, प्रॉक्सी वार और नैरेटिव वॉर अब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के स्थायी औज़ार बन चुके हैं। इस परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो गया है कि क्या दक्षिण एशिया को जानबूझकर ‘नया मध्य पूर्व’ बनाया जा रहा है और क्या भारत को उस इज़राइल जैसी भूमिका में धकेला जा रहा है, जहाँ वह लगातार संघर्ष में फँसा रहे—फर्क बस इतना होगा कि इज़राइल के पीछे पश्चिमी दुनिया खड़ी रही, जबकि भारत के मामले में अमेरिका, चीन और यूरोप सहित लगभग सभी शक्तियाँ उसके विरोधियों के पीछे खड़ी दिखाई दें। यह लेख किसी सनसनी या षड्यंत्र सिद्धांत का प्रचार नहीं करता, बल्कि वैश्विक राजनीति की संरचना, शक्तियों के हितों और भ...

Education, Political Transparency, and Democracy: India’s Current Tragedy

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  शिक्षा, राजनीतिक पारदर्शिता और लोकतंत्र: भारत की वर्तमान त्रासदी भारत आज शिक्षा और राजनीति के संगम पर एक अजीब स्थिति में खड़ा है। देश की शिक्षा प्रणाली और लोकतंत्र दोनों ही सख्त परीक्षणों से गुजर रहे हैं। यह परीक्षण केवल संस्थागत समस्याओं का परिणाम नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व की पारदर्शिता और योग्यता की कमी का भी संकेत है। इस लेख में हम विस्तार से देखेंगे कि कैसे प्रधानमंत्री की डिग्री अस्पष्ट, सत्ता धारी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबिन की 12वीं पास योग्यता, और विपक्ष के चेहरा तेजस्वी यादव का 9वीं फेल होना सीधे तौर पर शिक्षा, रोजगार और लोकतंत्र की गुणवत्ता पर असर डालता है। 1. शिक्षा की दुर्दशा: सिर्फ संस्थागत दोष नहीं Education Crisis: More Than Institutional Failures भारत में शिक्षा का संकट केवल स्कूल-कॉलेज और पाठ्यक्रम की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और नेतृत्व का असंगत रवैया इसे एक सामाजिक प्रहासन में बदलता है। अप्रासंगिक पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण: आधुनिक व्यावहारिक ज्ञान का अभाव, डिजिटल और तकनीकी शिक्षा में असमानता। शिक्षक और स...

शिक्षा, बेरोजगारी और राजनीतिक पारदर्शिता: भारत का वर्तमान परिदृश्य Education, Unemployment, and Political Transparency: India Today

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भारत में शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षित बेरोजगारी और राजनीतिक नेतृत्व की पारदर्शिता गंभीर चिंता के विषय हैं। दिसंबर 2025 तक PLFS के अनुसार कुल बेरोजगारी दर 5.1-5.6% के आसपास है, लेकिन युवा बेरोजगारी 13-15% और शिक्षित युवाओं में यह दर काफी ऊंची है (ILO/World Bank: उच्च शिक्षा प्राप्तों में 13-29%)। NEP 2020 के कार्यान्वयन में प्रगति हुई है, लेकिन डिजिटल डिवाइड और स्किल गैप बरकरार हैं। राजनीतिक नेताओं की योग्यता पर सवाल लोकतंत्र की जवाबदेही को प्रभावित करते हैं। यह लेख 2025 के प्रमाणित आंकड़ों पर आधारित है। tribuneindia.com cgdev.org शिक्षा की दुर्दशा: संस्थागत और संरचनात्मक समस्याएँ Education Crisis: Institutional and Structural Challenges NEP 2020 के तहत सुधार चल रहे हैं—5+3+3+4 संरचना, व्यावहारिक शिक्षा और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का विस्तार (2025 तक 67-82% संस्थानों में हाइब्रिड लर्निंग)। NISHTHA से शिक्षक प्रशिक्षण बढ़ा है। लेकिन चुनौतियां गंभीर हैं: अप्रासंगिक पाठ्यक्रम और रटंत प्रणाली। ग्रामीण स्कूलों में इंफ्रा और शिक्षक कमी (ASER: बुनियादी पढ़ाई में कमी)। डिजिटल असमानता: ग्रामीण क्षे...

बांग्लादेश संकट: चीन और अमेरिका का संयुक्त उपक्रम?

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  बांग्लादेश संकट: चीन और अमेरिका का संयुक्त उपक्रम दक्षिण एशिया में बांग्लादेश की 2024 क्रांति (जुलाई-अगस्त 2024) ने शेख हसीना की 15 वर्षीय सरकार का अंत किया, जिसके बाद 2025 में राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक चुनौतियां और अल्पसंख्यक हिंसा जारी रही। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने सुधारों का वादा किया, लेकिन संकट मुख्य रूप से आंतरिक कारकों—बेरोजगारी, सरकारी दमन और लोकतंत्र की कमी—से उपजा। कुछ विश्लेषणों में इसे चीन और अमेरिका की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का अप्रत्यक्ष परिणाम माना जाता है, जहां दोनों महाशक्तियां अपने हितों (आर्थिक प्रभाव बनाम लोकतंत्र संवर्धन) को आगे बढ़ा रही हैं। हालांकि, उपलब्ध शोध से "संयुक्त उपक्रम" का सीधा प्रमाण नहीं मिलता; बल्कि प्रतिस्पर्धा प्रमुख है। भारत, क्षेत्र का सबसे बड़ा पड़ोसी, इस अस्थिरता से सबसे अधिक प्रभावित होता है, जहां सीमा सुरक्षा और भूराजनीतिक संतुलन खतरे में हैं। सांप्रदायिक और राजनीतिक टकराव: स्थानीय जड़ें बांग्लादेश संकट की जड़ें मुख्य रूप से आंतरिक हैं: छात्र आंदोलन नौकरी कोटा सुधार से शुरू हुआ, लेकिन सरकारी हिंसा (संयुक्त र...

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में चीन और अमेरिका का निवेश

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  सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में चीन और अमेरिका का निवेश: एक प्रमाण-आधारित विश्लेषण दक्षिण एशिया में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण (धार्मिक विभाजन और टकराव) मुख्य रूप से आंतरिक कारकों से उत्पन्न होता है—जैसे चुनावी राजनीति, ऐतिहासिक विभाजन, और स्थानीय अवसरवाद। बाहरी शक्तियां जैसे चीन और अमेरिका अपने आर्थिक निवेश और सहायता के माध्यम से अप्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकती हैं, लेकिन उपलब्ध प्रमाणों (Carnegie Endowment, USIP, World Bank रिपोर्ट्स 2020-2025) से इनका सांप्रदायिक टकरावों में सीधा प्रोत्साहन या निवेश नहीं मिलता। ये निवेश मुख्य रूप से भूराजनीतिक और आर्थिक हितों से प्रेरित हैं। चीन का निवेश: BRI के माध्यम से आर्थिक प्रभाव चीन का दक्षिण एशिया में मुख्य निवेश बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत है, जो अवसंरचना, पोर्ट और ऊर्जा परियोजनाओं पर केंद्रित है (2025 तक कुल निवेश अरबों डॉलर में): पाकिस्तान : CPEC में $60 बिलियन से अधिक, लेकिन बलोचिस्तान में जातीय असंतोष बढ़ा (Carnegie, 2021; The Diplomat, 2022)। श्रीलंका : Hambantota पोर्ट और 2025 में $3.7 बिलियन ऑयल रिफाइनरी डील (Green Finance ...

China and US Investments in Communal Polarization

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China in South Asia   सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में चीन और अमेरिका का निवेश China and US Investments in Communal Polarization दक्षिण एशिया में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण—धार्मिक विभाजन और टकराव—मुख्य रूप से आंतरिक कारकों से उत्पन्न होता है, जैसे चुनावी राजनीति, ऐतिहासिक विभाजन, और स्थानीय अवसरवाद। बाहरी शक्तियां जैसे चीन और अमेरिका अप्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकती हैं, लेकिन उपलब्ध प्रमाण (Carnegie Endowment, USIP, World Bank 2020–2025) दिखाते हैं कि ये निवेश सीधे सांप्रदायिक टकराव को भड़काने के लिए नहीं हैं । उनका उद्देश्य मुख्य रूप से भूराजनीतिक और आर्थिक हित है। चीन का निवेश: BRI के माध्यम से आर्थिक प्रभाव China’s Investments: Economic Leverage via BRI चीन का मुख्य निवेश बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत है, जो अवसंरचना, पोर्ट और ऊर्जा परियोजनाओं पर केंद्रित है (2025 तक अरबों डॉलर में): पाकिस्तान: CPEC में $60 बिलियन से अधिक; बलोचिस्तान में जातीय असंतोष बढ़ा (Carnegie, 2021; The Diplomat, 2022) श्रीलंका: Hambantota पोर्ट और 2025 में $3.7 बिलियन ऑयल रिफाइनरी डील (Green Fin...

दक्षिण एशिया में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: चीन और अमेरिका की भूमिका तथा उनके निवेशों का प्रभाव

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  दक्षिण एशिया (भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल आदि) में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और टकराव मुख्य रूप से आंतरिक कारकों से उत्पन्न होते हैं—जैसे धार्मिक पहचान, चुनावी राजनीति, ऐतिहासिक विभाजन (1947 का बंटवारा) और आर्थिक असमानता। हाल के वर्षों में भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर हमले, बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हिंसा (2024 की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद) और पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार बढ़े हैं। ये मुद्दे स्थानीय राजनीतिक अवसरवाद से प्रेरित हैं, जहां अल्पसंख्यकों को वोट बैंक या scapegoat बनाया जाता है (Carnegie Endowment और USIP रिपोर्ट्स, 2020-2025)। चीन की भूमिका और निवेश (Belt and Road Initiative - BRI) चीन दक्षिण एशिया में मुख्य रूप से आर्थिक निवेश के माध्यम से प्रभाव बढ़ा रहा है, विशेषकर BRI के तहत: पाकिस्तान : China-Pakistan Economic Corridor (CPEC) में अरबों डॉलर का निवेश, लेकिन बलोचिस्तान में जातीय असंतोष बढ़ा (Carnegie, 2021)। श्रीलंका : Hambantota पोर्ट जैसी परियोजनाएं, जो ऋण जाल का उदाहरण बनीं। नेपाल, बांग्लादेश : अवसंरचना निवेश, ज...